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    बिहार नगर निकाय चुनाव की मान्यता रहेगी या सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी होगी रद्द? जाने एक्सपर्ट की राय

    बिहार नगर निकाय चुनाव की मान्यता रहेगी या सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी होगी रद्द? जाने एक्सपर्ट की राय
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    We News 24 Digital»रिपोर्टिंग सूत्र  / दीपक कुमार 

    पटना : हाई कोर्ट के रोक के बाद भी बिहार में आनन फानन में कराया गया नगर निकाय चुनाव इस निकाय चुनाव को लेकर अभी भी संशय बरकरार है। लोगो ने चुनाव में पानीकी तरह पैसा बहाया .  चुनाव आयोग ने  बिहार में 18 दिसंबर और 28 दिसंबर को चुनाव को हुआ जिसकी रिजल्ट  30 दिसंबर को आना है . लेकिन  सुप्रीम कोर्ट में 20 जनवरी को इसी चुनाव से संबंधित एक मामले की सुनवाई होनी है। इसमें  बिहार सरकार की ओर से गठित अति पिछड़ा वर्ग आयोग की योग्यता पर फैसला होना है।

    बिहार नगर निकाय चुनाव की मान्यता रहेगी या सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी होगी रद्द? जाने एक्सपर्ट की राय
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    ऐसे में तीन सवाल उठ रहे हैं:-

    1-क्यों बिहार सरकार कोर्ट फैसले का नहीं किया इन्तजार ?

     2-क्या चुनाव के बाद भी इसमें बदलाव हो सकता है?

    3-  क्या नितीश सरकार की जिद का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।


    इसे समझने के लिए इस मामले से जुड़े सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की भाषा में समझे

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    महाराष्ट्र की तर्ज पर बिहार के मामले में भी आ सकता है फैसला

    सुप्रीम कोर्ट में वादी का पक्ष रख रहीं एडवोकेट मीनाक्षी अरोड़ा ने  वो इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि फैसला उनके पक्ष में आएगा। इस मामले में नितीश सरकार को बैकफुट पर आना होगा। दैनिक भास्कर अख़बार से बातचीत में उन्होंने महाराष्ट्र के एक मामले का उदाहरण देते हुए समझाया कि ये आरक्षण से जुड़ी उसी तरीके का मामला है। महाराष्ट्र के मामले में भी सरकार को बैक फुट पर आना पड़ा था। ये भी उसी तरह का मामला है ।

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    महाराष्ट्र में आरक्षण पर क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला

    2021 में महाराष्ट्र की उद्धव सरकार ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की तर्ज पर अध्यादेश लाकर ओबीसी आरक्षण लागू करने का निर्णय लिया था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण प्रतिशत को उचित ठहराए जाने के आंकड़े को पर्याप्त नहीं माना। इसके बाद ने राज्य के उन स्थानीय निकायों में जहां ओबीसी आरक्षण दिए गए थे चुनाव पर रोक लगा दी। बाद में ओबीसी के लिए आरक्षित सीटों को सामान्य में तब्दील करवा कर वहां चुनाव करवाए गए।

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    अति पिछड़ा वर्ग आयोग पर क्या है विवाद

    पटना हाईकोर्ट की तरफ से निकाय चुनाव पर रोक लगाने के बाद बिहार सरकार की तरफ से अक्टूबर में आनन-फानन में अति पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया गया। दो महीने के भीतर कमेटी अपनी रिपोर्ट सरकार को दी। इससे पहले ही मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी को डेडिकेडेट मानने से ही इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी सरकार उसी कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर राज्य निर्वाचन आयोग को चुनाव कराने की अनुशंसा कर दी। अनुशंसा मिलते ही निर्वाचन आयोग ने नए डेट की घोषणा कर दी ।

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    रिपोर्ट के बाद भी केवल चुनाव की डेट बदली, इसके अलावा कुछ नहीं बदला 

    10 और 20 अक्टूबर को आयोजित होने वाली नगर निकाय चुनाव को 6 दिन पहले हाईकोर्ट ने स्थगित कर दिया था। तब हाईकोर्ट ने कहा था कि अति पिछड़ा वर्ग (EBC) के लिए 20% आरक्षित सीटों को जनरल कर नए सिरे से नोटिफिकेशन जारी करें। लेकिन निर्वाचन आयोग की तरफ से बस चुनाव की तिथि को बदला गया। इसके अलावा किसी तरह का कोई बदलाव नहीं किया गया है।न हीं आरक्षण की स्थिति में और न ही अलग से नोटिफिकेशन जारी किया गया है।हमने अपने पहले खबर में लिखा था की माल पुराना लेबल नया है .

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    सर्वे के बाद भी नहीं बदला आरक्षण का आंकड़ा

    पटना हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट शशि भूषण मंगलम ने दैनिक भास्कर अखबार को बताया कि ईबीसी का गहन अध्ययन के बाद डेटा तैयार करना था। लेकिन इसके नाम पर बस खानापूर्ति की गई है।उन्होंने बताया कि बिना डेटा के भी आरक्षण का दर 20% था। आरक्षण के बाद भी 20% भी रहा गया।यह कैसे संभव है ? वे कहते हैं कि रिपोर्ट सरकार के पास से होते हुए निर्वाचन आयोग तक पहुंच गई है लेकिन उसे अभी तक जारी नहीं किया गया है। इससे भी पता चलता है कि इसमें घालमेल किया गया है।

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    अब समझिए इस आयोग को क्या करना था

    डेडिकेटेड कमीशन को राज्य के सभी नगर निकायों में अति पिछड़ा वर्ग के जातियों को डाटा कलेक्ट करना था। इसके साथ ही इन्हें पता लगाना था कि नगर पालिका की कुल जनसंख्या में पिछड़ों की संख्या कितनी है, यह कितना प्रतिशत होती है। साथ ही इनकी कुल जनसंख्या क्या है . ये भी पता लगाना था।टोटल जनसंख्या के अनुपात के अनुसार उनका प्रतिनिधित्व कितना है . कि नहीं इसकी रिपोर्ट इन्हें सरकार को सौंपनी थी। इसमें यह भी निर्धारित करना था कि किसी मामले में आरक्षण अपर सिलिंग 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए ।

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    आयोग के अध्यक्ष ने कुछ भी बताने से किया इनकार

    दैनिक भास्कर अख़बार ने जब  अति पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष नवीन कुमार आर्य से रिपोर्ट बनाने की प्रक्रिया और इसके रिजल्ट पर सवाल पूछे तो उन्होंने इस पर कुछ भी बताने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे फिलहाल इस मामले में कुछ भी नहीं बोल सकते हैं। यह पूछने पर कि क्या यह गोपनीय मामला है, इस पर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा।

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    निर्वाचन आयोग के वकील ने कहा- हमारी तैयारी पूर

    दैनिक भास्कर ने निर्वाचन आयोग का पक्ष रखने वाले हाईकोर्ट के वकील से भी बात की। उन्होंने कहा कि उनकी तैयारी पूरी है। इस विषय में फिलहाल इससे ज्यादा कुछ नहीं बोल सकता हूं। मामला हाईकोर्ट में पेंडिंग है। सुनवाई होगी तब हम अपना पक्ष रखेंगे। उन्होंने कहा कि चुनाव कराने के लिए हमारी सारी तैयारी कर ली गई है।

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    12 साल में सरकार नहीं करा पाई थी ट्रिपल टेस्ट

    2010 में चुनाव में आरक्षण को लेकर के कृष्णमूर्ति केस चैलेंज हुआ था। केस इस ग्राउंड पर चैलेंज किया गया था कि बिना सर्वे कराए पूरे देश में सरकार द्वारा वोट बैंक बनाने के लिए चुनाव में आरक्षण दिया जा रहा। इस केस में फैसला ट्रिपल टेस्ट का आया। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद ट्रिपल टेस्ट को चुनाव में आरक्षण के लिए एक बड़ा पैमाना माना गया।

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    याचिकाकर्ता के वकील का तर्क

    याचिकाकर्ता के वकील रवि रंजन ने कहा कि संविधान में राजनीतिक पिछड़ेपन पर चुनाव में आरक्षण की परिकल्पना की गई है। , जो सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर परिकल्पित सार्वजनिक रोजगार और उच्च शिक्षा में दिए गए आरक्षण से अलग है। रंजन ने तर्क दिया कि 'राजनीतिक आरक्षण को लागू करने के लिए, राजनीतिक पिछड़ेपन के पहले अनुभवजन्य डेटा को एक समर्पित प्राधिकरण द्वारा एकत्र किया जाना चाहिए और समय-समय पर साझा और समीक्षा की जानी चाहिए और फिर आरक्षण की व्यवहार्यता का परीक्षण किया जाना चाहिए।'

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    बिहार सरकार से जवाब तलब

    उन्होंने कहा कि इस तरह के मानदंड 2010 में के कृष्णमूर्ति मामले में सर्वोच्च न्यायालय की एक संविधान पीठ द्वारा निर्धारित किए गए थे। इससे पहले, पटना उच्च न्यायालय ने भी 1996 में एक फैसला पारित किया था, जिसमें कहा गया था कि राजनीतिक आरक्षण पिछड़ेपन के अनुपात में होना चाहिए। राज्य सरकार ने डेटा संग्रह, साझाकरण और व्यवहार्यता परीक्षण के पूर्वोक्त अभ्यास किए बिना, सीधे बिहार में ईबीसी श्रेणियों को आरक्षण दिया, जो कि सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ पटना उच्च न्यायालय के फैसलों का उल्लंघन है।' उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के वकील की दलीलों की सराहना करते हुए डेटा संग्रह पर राज्य सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा था । 

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