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    Simdega News : अजब गजब है सिमडेगा जिले के जंगलों में बसी मां वनदुर्गा का इतिहास

    Simdega News: मां वनदुर्गा पूरी करती हैं भक्तों की मनोकामना, जाने कब और कैसे बना मां वनदुर्गा मंदिर
    तस्वीर @ वी न्यूज 24 


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    We News 24 Digital News» रिपोर्टिंग सूत्र  / दीपक कुमार

    सिमडेगा : झारखंड राज्य के सिमडेगा जिले के बोलवा अंतर्गत मलासाड़ा गांव में ऊंचे- ऊंचे घने सखुआ के पेड़ एवं चारों और पहाड़ों से घिरे आदिशक्ति मां भुवनेश्वरी अपने वनदुर्गा रूप में विराजमान है, जो वनदुर्गा जागृत मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है। सिमडेगा जिला सहित बिहार, ओड़िशा, छत्तीसगढ़ के भक्तों की इस मंदिर से अपार श्रद्धा जुड़ा है। वनदुर्गा मंदिर का संचालन स्थानीय भक्तों द्वारा किया जा जाता है। विशेष रूप से चैत्र, अश्विन एवं रामनवमी पर्व का विशेष आयोजन किया जाता है। मंदिर में सच्चे मन व श्रद्धा से मांगी गयी मन्नतें मां वनदुर्गा पूर्ण करती है। भक्त मन्नतें पुरी होने पर मां को बकरे का बलि अर्पण करते हैं। नवरात्र के मौके पर नौ दिनों तक बलि पुजा रोक दी जाती है और पुन: विजयादशमी से बलि पूजा प्रारंभ कर दी जाती है।यह  स्थल हिंदुओं के लिए यह एक आस्था का केंद्र है . 

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    इस वजह से वनदुर्गा नाम पड़ा 

    सन 1806 ईस्वी में मलासाड़ा गांव के महादान टोंगरी में सखुआ पेड़ के खोड़हर मे मां वनदुर्गा की मूर्ती को स्थानीय लोगो ने देखा। उसके कुछ दिनों के बाद वहां से मूर्ति गायब  हो गया  . माना जाता है  कि सरना स्थल के खोडर में मां वनदुर्गा प्रकट होने का स्वप्न गांव के पाहन विश्वनाथ सिंह ने देखा . पाहन विश्वनाथ सिंह के साथ कुछ ग्रामीणों ने मिलकर सरना स्थल पर आकर देखा तो वहां सचमुच में मां वनदुर्गा के मूर्ति थी । ग्रामीणों ने इस बात की जानकारी टैसर के राजा जगतपाल सिंह को दी । राजा ने अपने  प्रजा के साथ सरना स्थल आये तो देखा तो वहां पर  मूर्ति था। लोगों ने वनों के बीच पेड़ के खोदर में मूर्ति पाए जाने के वजह से इस मूर्ति का नाम मां वन दुर्गा रखा । 

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    माँ वनदुर्गा ब्राह्मण की पूजा स्वीकार नहीं किया 

     इसके बाद विशेष पूजा अर्चना के पश्चात मूर्ति को  वर्तमान सरना स्थल में सखुआ के पेड़ के नीचे स्थापित किया . एक ही दिन में ही राजा के आदेशानुसार पत्थर और लकड़ी इकट्ठा करके एक छोटा सा मंदिर बनाया गया । उस मंदिर में मूर्ति को स्थापित किया गया । राजा ने माता की अच्छी से सेवा पूजा हो ऐसा ख्याल कर ब्राह्मण को नियुक्त किया लेकीन माता ने उक्त ब्राह्मण का पूजन स्वीकार नहीं किया और एक दिन माता ने  क्रोध से उस ब्राह्मण को मंदिर से उठाकर बाहर फेंक दिया जो एक सखुआ के पेड़ से टकराया और ब्राह्मण की मौत हो गई।

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    राजा ने पाहन पुजारी नियुक्त किया

     तत्पश्चात राजा ने पाहन विश्वनाथ सिंह को पुजारी नियुक्त किया । पाहन विश्वनाथ सिंह के बाद रूपनाथ सिंह मनी सिंह प्रसाद सिंह एतवा सिंह के बाद वर्तमान में गजेंद्र सिंह को पाहन के रूप में नियुक्त किया गया । राजा द्वारा 2 एकड़ पहनई दोन जमीन सरना स्थल सह मंदिर स्थल पर खाता नंबर 321 प्लाट नंबर 4372 रखवा 8.64 एवं महादान टोंगरी के पास 16 एकड़ जमीन सुरक्षित रखा है ।

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    शतचंडी महायज्ञ का आयोजन

    सन 1957 ईस्वी में दक्षिण भारतीय एक सन्यासी भ्रमण करते हुए केरसई करम टोली गांव के जमींदार नागेश्वर प्रसाद के वहां पहुंचे वहां से भ्रमण करते हुए वनदुर्गा स्थल पर पहुंचे । उन्होंने इस क्षेत्र में मां वनदुर्गा की विशेष कृपा बताएं तथा शतचंडी महायज्ञ का आयोजन करने का प्रस्ताव रखा । नागेश्वर प्रसाद ने यह बात पंडित मदन गोपाल मिश्र रामबरन साहू धनेश्वर साहू तिलकमन साहू श्याम लाल साहू आदि से सन्यासी द्वारा कही गई बातों को बताया ।सभी लोग यज्ञ करने की बात से सहमत हो गए । और तैयारी शुरू कर दी विधि विधान के साथ शतचंडी महायज्ञ उस सन्यासी के देखरेख में संपन्न हुआ। यज्ञ के दौरान यज्ञ स्थल के आसपास एवं चारों ओर बिच्छू सांप आदि अत्याधिक मात्रा में प्रकट हुए किंतु किसी को कोई हानि नहीं पहुंचाई ।  इसी दौरान उत्तर दिशा से एक बाध गरजते हुए यज्ञ स्थल को घूमते हुए माता की उत्पत्ति स्थल की ओर गया। इस घटना को माता की महिमा बताई गई .

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    यज्ञ के लिए बईलघोवा नदी से घी लिया गया 

     पंडित मदन गोपाल मिश्र एवं यज्ञ में शामिल लोगों के अनुसार महायज्ञ करते समय धी कम पड़ गया तो लोगों ने बाबा से यह बात बताएं बाबा ने पास के बईलघोवा नदी में  कुछ लोगों को भेज कर वरुण देवता से 3 टन घी उधार मांग लिया अर्थात नदी के पानी को मंगाया जो यज्ञ मंडप तक पहुंचकर घी में बदल गया यज्ञ की समाप्ति के पश्चात कार्यकर्ताओं ने 3 तीन  घी इकट्ठा करके बईलघोवा नदी में वापस दे दिया । सन्यासी द्वारा स्मृति के रूप में दिया गया तलवार आज भी नागेश्वर प्रसाद के यहां मौजूद है।

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    वनदुर्गा उत्पत्ति स्थल को लेकर हिंदू और ईसाईयों में विवाद 

     सन 1984 में मां वनदुर्गा उत्पत्ति स्थल को लेकर हिंदू और ईसाईयों में विवाद शुरू हो गया । दोनों पक्षों के द्वारा बोलवा थाने में शिकायत दर्ज कराया गया । विवाद के दौरान ही महादान टोंगरी में एक और मूर्ति का दर्शन हुआ वहां पर एक और झंडा गाड़ दिया गया । और पूजा-अर्चना शुरू कर दी गई। बोलवा थाना के जमादार ठाकुर सिंह एसडीओ शिवपूजन सिंह डीएसपी रामदयाल उड़ाव  अंचल अधिकारी एवं वन विभाग के अधिकारीगण विवाद का समझौता कराने आए । समझौता में बात मानते हुए ईसाईयों ने उक्त स्थल में गाड़े गए क्रूस ले गए किंतु हिंदुओं ने अपना झंडा एवं मूर्ति नहीं हटाया ।तब अधिकारियों ने वहां के मूर्ति और झंडे को उखाड़  दिया और साथ ले गए । इसके बाद कई लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज किया गया मामला कोर्ट में चला गया दोनों पक्ष के लोगों ने कोर्ट आना जाना शुरू कर दिया।


    दैविक प्रकोप से एसडीओ डीएसपी परेशान

    कुछ दिनों के बाद एसडीओ शिवपूजन राम एवं डीएसपी रामदयाल दैविक प्रकोप से परेशान हो गए उन्होंने अपनी गलती का अनुभव होने लगा और अंतता मूर्ति को वापस लाकर उसी स्थान पर पहुंचा दिया वह मूर्ति महादान डूंगरी में स्थापित की गई है और एक छोटा सा मंदिर का निर्माण भी किया गया है जिसे मां समलेश्वरी के नाम से पूजा जा रहा है बताया जाता है कि मां दुर्गा की ही छोटी बहन है समलेश्वरी विवाद के समय केस लड़ने के लिए सिमडेगा का कोई वकील तैयार नहीं हुआ तो खून पी के वकील राजकिशोर महतो को सिमडेगा लाया गया और कोर्ट ने केस का फैसला वनदुर्गा समिति के लोगों के पक्ष में दिया . इस दरमियान एसडीओ शिवपूजन राम की मिर्त्यु हो गयी  उनकी पत्नी राजकिशोर महतो का पांव पकड़कर अपराध के लिए क्षमा याचना की स्वर्गीय राजकिशोर महतो ने मां वनदुर्गा से क्षमा मांगने को कहा उनकी पत्नी क्षमा मांगने आई थी . विवाद के समय में एसके निर्मल कुमार सिंह अथवा सिंह केसरी सिंह शीतल प्रसाद श्याम लाल शर्मा ओम प्रकाश साहू ओम प्रकाश अग्रवाल आदि कई लोगों का योगदान रहा .


    1984 में मंदिर बनकर पूरा हुआ 

    मां दुर्गा की प्रसिद्धि धीरे-धीरे दिनों दिन बढ़ती गई और रामरेखा धाम से संबंध हुआ रामरेखा धाम से जोड़ने एवं यहां के लोगों में जागृति लाने में श्याम शंकर प्रसाद की भूमिका सराहनीय रही उस उस समय रामरेखा धाम हिंदू धर्म रक्षा समिति के रूप में विकसित हो रहा था रामरेखा बाबा ब्रह्मलीन 1008 श्री जयराम प्रपन्ना जी महाराज की प्रेरणा से मालसाड़ा में बन दुर्गा स्थल में दुर्गा मंदिर का काम जनसहयोग से शुरू हुआ तथा 1984 में मंदिर बनकर पूरा हो गया मंदिर की प्रतिष्ठा करके मां वंदुर्गा को यहां स्थापित करके पूजन अर्चन किया जा रहा है बाद में यहां रतिया समाज के द्वारा एकत्रित धन से एक बजरंगबली का मंदिर भी बनाया गया जो मां बन दुर्गा मंदिर के अपने विशाल रूप में भक्तों को दर्शन दे रहे हैं प्रशासन का इस स्थल को विकास करने के लिए पूरी कोशिश है और कई तरह की योजनाएं भी दी जा रही है .



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