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    गोल इंस्टीट्यूट के 28 साल: एक छोटे कमरे से गांव तक का सफर, 20 हजार डॉक्टरों की कहानी

     

    गोल इंस्टीट्यूट के 28 साल: एक छोटे कमरे से गांव तक का सफर, 20 हजार डॉक्टरों की कहानी


    We News 24 : डिजिटल डेस्क »✍️रिपोर्ट: कलीम अंसारी 

    प्रकाशन तिथि: 25 दिसंबर

    पटना: आज जब पटना के गोल विलेज में सैकड़ों बच्चे किताबें खोले बैठे हैं, सपने संजोए हुए, तो यह सफर 28 साल पहले एक छोटे से 8 बाई 8 के कमरे से शुरू हुआ था। उस वक्त किसी को पता नहीं था कि यह छोटा-सा कदम एक दिन हजारों बच्चों की जिंदगी बदल देगा। संस्थापक खुद बताते हैं कि पढ़ाई बीच में छोड़कर एक नया आइडिया दिमाग में आया – पढ़ाई तो सब करते हैं, लेकिन असली चुनौती है नॉलेज को मार्क्स में कैसे बदला जाए। यही सोच गोल इंस्टीट्यूट की नींव बनी।

    28 सालों में गोल से 20 हजार से ज्यादा डॉक्टर निकल चुके हैं। ये बच्चे न सिर्फ देश के बड़े-बड़े मेडिकल कॉलेजों में पहुंचे, बल्कि विदेशों में भी भारत का नाम रोशन कर रहे हैं – यूके, ऑस्ट्रेलिया, फिनलैंड तक। आज भी हर साल 1500 से ज्यादा नए बच्चे कई राज्यों से यहां आते हैं, डॉक्टर बनने का सपना लेकर। बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ के गांवों से लेकर यूपी-बंगाल तक के बच्चे।



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    गोल की सबसे बड़ी खासियत रही उसका इनोवेशन। देश में पहली बार टेस्ट सीरीज और प्रैक्टिस सेंटर की व्यवस्था यहीं से शुरू हुई। संस्थापक कहते हैं, "बच्चों को पता नहीं था कि नॉलेज को मार्क्स में कैसे कन्वर्ट करें। हमने फ्रीक्वेंट टेस्ट लिए, गलतियां पकड़ीं, टीचरों ने समझाया – और रिजल्ट उम्मीद से कहीं ज्यादा अच्छे आए।" पहले जहां बच्चे 7-8 साल लगाते थे, वहीं गोल की व्यवस्था से 1-2 साल में ही सफलता मिलने लगी। पैसे कम लगते थे, समय कम लगता था – और रैंक अच्छे आते थे।

    1998 में बनारस में पहली ब्रांच खुली, फिर दिल्ली, लखनऊ, इलाहाबाद... आज बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ में 18 ब्रांचें हैं। उस जमाने में भी 9-10 हजार बच्चों को सर्विस दी जाती थी। दिल्ली का एम्स हो या कोई टॉप मेडिकल कॉलेज, गोल के बच्चे वहां पहुंचते थे। बिहार के बच्चे मेहनत करते हैं, क्योंकि जानते हैं कि पढ़ाई ही जिंदगी बदलेगी। झारखंड अलग होने के बाद भी हालात मुश्किल रहे, लेकिन गोल ने गांव के बच्चों के लिए एक अनोखा प्रयोग किया – गोल विलेज।


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    यहां गरीब घर के बच्चे भी हिम्मत जुटाकर आ सकते हैं। कम पैसे में अच्छी व्यवस्था, अच्छे टीचर, हॉस्टल – सब कुछ। सिर्फ पढ़ाई नहीं, सपनों को हकीकत बनाने की पूरी कोशिश। संस्थापक कहते हैं, "इन बच्चों का क्रेडिट बच्चों की मेहनत, उनके आत्मविश्वास और माता-पिता के त्याग को जाता है। अगर वे विश्वास न करते, तो हम यहां न पहुंचते।"

    वी न्यूज 24 की नजर में गोल इंस्टीट्यूट बिहार की शिक्षा की एक मिसाल है। जहां बड़े-बड़े कोचिंग शहरों में चमकते हैं, वहां गोल ने गांव तक पहुंच बनाई। आज जब देश में मेडिकल की पढ़ाई महंगी होती जा रही है, ऐसे संस्थान उम्मीद जगाते हैं कि मेहनत और सही दिशा से कोई भी सपना पूरा हो सकता है। गोल के ये 28 साल सिर्फ एक संस्थान की कहानी नहीं, हजारों बच्चों की जिंदगी बदलने की दास्तान है।



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