सिमडेगा में स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा सवाल: इलाज के अभाव में भाजपा नेता की मौत
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✍️रिपोर्ट: सीनियर पत्रकार ,दीपक कुमार
📍 सिमडेगा , झारखंड | मंगलवार,03 मार्च 2026
सिमडेगा: झारखंड का जिला मुख्यालय होने के बावजूद Simdega आज भी एक सुसज्जित और भरोसेमंद स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए तरस रहा है। बड़े-बड़े सरकारी प्रशासनिक भवनों के बीच बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं की कमी अब जानलेवा साबित हो रही है। ताजा मामला जलडेगा के भाजपा नेता रामेश्वर सिंह की मौत से जुड़ा है, जिसने पूरे जिले में स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अचानक बिगड़ी तबीयत, समय पर नहीं मिला इलाज
जानकारी के अनुसार जलडेगा में रामेश्वर सिंह की तबीयत अचानक बिगड़ गई। परिजन उन्हें तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे, लेकिन आरोप है कि वहां डॉक्टर और कर्मियों की अनुपस्थिति के कारण समय पर उपचार शुरू नहीं हो सका। स्थिति बिगड़ती देख उन्हें सदर अस्पताल, सिमडेगा रेफर किया गया।
परिजनों का कहना है कि सदर अस्पताल में भी न तो समुचित इमरजेंसी व्यवस्था थी और न ही वेंटिलेटर जैसी जीवनरक्षक सुविधा उपलब्ध थी। मजबूरन उन्हें बेहतर इलाज की उम्मीद में बीरू स्थित शांति मेडिकल सेंटर ले जाया जा रहा था, लेकिन रास्ते में ही उनकी मौत हो गई।
“समय पर इलाज मिलता तो जान बच सकती थी”
घटना के बाद भाजपा जिला अध्यक्ष दीपक पुरी और महामंत्री मुकेश श्रीवास्तव ने राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग को कठघरे में खड़ा किया। उनका कहना है कि यदि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और सदर अस्पताल में डॉक्टर, इमरजेंसी सुविधा और वेंटिलेटर उपलब्ध होते, तो संभव है कि रामेश्वर सिंह की जान बचाई जा सकती थी।
जिला मुख्यालय, लेकिन बुनियादी सुविधा नहीं
स्थानीय लोगों का कहना है कि सिमडेगा में अब तक एक आधुनिक पैथोलॉजी लैब, ICU और ट्रॉमा सेंटर जैसी सुविधाएं विकसित नहीं की गई हैं। गंभीर स्थिति में मरीजों को या तो 95 किलोमीटर दूर Rourkela या 170 किलोमीटर दूर Ranchi ले जाना पड़ता है। आपातकालीन स्थितियों में यह दूरी अक्सर जानलेवा साबित होती है।
जनता में आक्रोश, जांच और सुधार की मांग
घटना के बाद परिजनों और स्थानीय लोगों में आक्रोश है। लोगों ने स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की नियमित उपस्थिति, 24x7 इमरजेंसी सेवा, वेंटिलेटर और एम्बुलेंस व्यवस्था को दुरुस्त करने की मांग की है।
सवाल यह है कि जब सिमडेगा जिला बन चुका है, तो क्या यहां की जनता को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा का अधिकार नहीं? क्या प्रशासन केवल भवन निर्माण तक सीमित रह गया है, जबकि जीवनरक्षक सुविधाएं अब भी भगवान भरोसे हैं?
यह घटना केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बनकर सामने आई है। अब देखना यह है कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग इस मामले में क्या कदम उठाते हैं।
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