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    दिल्ली के 70 साल: 1956 में क्यों छिनी विधानसभा, 1993 में कैसे लौटा लोकतंत्र? जानिए राजधानी में सत्ता के बंटवारे की पूरी कहानी

     

    दिल्ली के 70 साल: 1956 में क्यों छिनी विधानसभा, 1993 में कैसे लौटा लोकतंत्र? जानिए राजधानी में सत्ता के बंटवारे की पूरी कहानी


    दिल्ली के केंद्रशासित प्रदेश बनने के 70 साल पूरे। जानिए 1952 की पहली विधानसभा, 1956 में उसके अंत, 1993 में लोकतंत्र की वापसी और CM-LG के अधिकारों की पूरी कहानी।

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     रिपोर्ट : डिजिटल डेस्क   | स्थान: दिल्ली   |   | प्रकाशित:  6 नवंबर 2026

    नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली की सुबह में सत्ता के कई केंद्र एक साथ दिखाई देते हैं। एक ओर संसद भवन है, जहां देश के कानून बनते हैं। राष्ट्रपति भवन और केंद्रीय मंत्रालय हैं, जहां केंद्र सरकार के बड़े फैसले लिए जाते हैं। दूसरी ओर दिल्ली सचिवालय है, जहां राष्ट्रीय राजधानी की चुनी हुई सरकार बैठती है। इनके बीच उपराज्यपाल का कार्यालय भी है, जो केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में संवैधानिक और प्रशासनिक भूमिका निभाता है।

    यानी एक ही शहर में केंद्र सरकार, निर्वाचित दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल की अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं। यही व्यवस्था दिल्ली को देश के अन्य राज्यों से अलग बनाती है।

    दिल्ली में मुख्यमंत्री और विधानसभा होने के बावजूद यह पूर्ण राज्य नहीं है। संविधान के तहत पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था और जमीन जैसे महत्वपूर्ण विषय केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में हैं। यही वजह है कि दिल्ली में अक्सर यह सवाल उठता है कि राजधानी के प्रशासन में अंतिम अधिकार किसके पास होना चाहिए—जनता की चुनी हुई सरकार के पास या केंद्र सरकार के पास?

    आखिर देश की राजधानी को केंद्रशासित प्रदेश क्यों बनाया गया? 1952 में बनी विधानसभा को महज चार साल बाद क्यों समाप्त कर दिया गया? 1966 में महानगर परिषद के रूप में सीमित प्रतिनिधित्व कैसे लौटा और 1993 में दिल्ली को फिर से विधानसभा कैसे मिली? इन सवालों के जवाब दिल्ली के सात दशक के राजनीतिक और संवैधानिक इतिहास में छिपे हैं।

    1 नवंबर 2026 को दिल्ली के केंद्रशासित प्रदेश बनने के 70 वर्ष पूरे हुए। इस अवसर पर पढ़िए राजधानी की सत्ता, सियासत और लोकतांत्रिक अधिकारों के बदलते सात दशकों की पूरी कहानी।

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    इंद्रप्रस्थ से नई दिल्ली तक: कैसे बदली राजधानी की पहचान?

    दिल्ली का इतिहास बहुत पुराना है। इसका संबंध महाभारत में वर्णित इंद्रप्रस्थ से जोड़ा जाता है, हालांकि इसके ऐतिहासिक प्रमाणों और सटीक कालखंड को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। अलग-अलग समय में इस क्षेत्र में कई नगर बसे और उजड़े। तोमर, चौहान, दिल्ली सल्तनत और मुगल शासकों ने इस क्षेत्र को अलग-अलग दौर में सत्ता का केंद्र बनाया।

    मुगल काल में शाहजहानाबाद के निर्माण ने दिल्ली की पहचान को नया रूप दिया। बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान भी दिल्ली का राजनीतिक महत्व बना रहा, लेकिन ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता (अब कोलकाता) थी।


    1911 में बदली भारत की राजधानी

    12 दिसंबर 1911 को दिल्ली दरबार में ब्रिटेन के सम्राट जॉर्ज पंचम ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की। इस फैसले के पीछे प्रशासनिक, राजनीतिक और सामरिक कारण बताए जाते हैं। नई राजधानी के निर्माण के लिए रायसीना हिल और उसके आसपास का इलाका चुना गया।

    नई राजधानी की योजना तैयार करने की जिम्मेदारी एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर जैसे वास्तुकारों को सौंपी गई। उन्होंने चौड़ी सड़कों, विशाल सरकारी इमारतों, खुले मैदानों और व्यवस्थित शहरी ढांचे वाली राजधानी की कल्पना को आकार दिया।

    31 दिसंबर 1926 को नई राजधानी को 'नई दिल्ली' नाम दिए जाने की आधिकारिक घोषणा हुई। इसके बाद 15 फरवरी 1931 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने नई दिल्ली का औपचारिक उद्घाटन किया।

    इस तरह दिल्ली को आधुनिक भारत की राजधानी के रूप में नई पहचान मिली। लेकिन आजादी के बाद एक बड़ा सवाल सामने आया—जब दिल्ली पूरे देश की सत्ता का केंद्र है, तो इसके स्थानीय प्रशासन की कमान किसके हाथ में होनी चाहिए?


    आजादी के बाद दिल्ली को मिला पार्ट-C राज्य का दर्जा

    15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ। उस समय दिल्ली को पार्ट-C राज्य की श्रेणी में रखा गया। यह व्यवस्था सामान्य राज्यों से अलग थी। यहां केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में मुख्य आयुक्त प्रशासन संभालते थे, लेकिन सीमित अधिकारों वाली विधानसभा और मंत्रिपरिषद बनाने का प्रावधान भी किया गया।

    इसके लिए संसद ने Government of Part C States Act, 1951 बनाया। इसी कानून के तहत दिल्ली में विधानसभा चुनाव कराने का रास्ता खुला।



    1952 में बनी दिल्ली की पहली विधानसभा, चौधरी ब्रह्म प्रकाश बने मुख्यमंत्री

    दिल्ली में पहली विधानसभा के लिए 1951-52 के दौरान चुनाव हुए। 7 मार्च 1952 को दिल्ली की पहली विधानसभा अस्तित्व में आई। इसमें कुल 48 सदस्य थे।

    कांग्रेस नेता चौधरी ब्रह्म प्रकाश दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री बने। उन्होंने 17 मार्च 1952 को पद की शपथ ली। उस समय दिल्ली में मुख्यमंत्री के साथ मुख्य आयुक्त की भी महत्वपूर्ण प्रशासनिक भूमिका थी।

    इस व्यवस्था में मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद के पास सीमित अधिकार थे। कई प्रशासनिक मामलों में मुख्य आयुक्त की भूमिका प्रभावशाली बनी हुई थी। यही स्थिति आगे चलकर अधिकारों के टकराव की वजह बनी।


    मुख्यमंत्री और मुख्य आयुक्त के बीच क्यों हुआ विवाद?

    दिल्ली की पहली सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अधिकारों का स्पष्ट बंटवारा नहीं होना था। एक ओर जनता द्वारा चुनी गई विधानसभा और मुख्यमंत्री थे, तो दूसरी ओर केंद्र सरकार के प्रतिनिधि मुख्य आयुक्त प्रशासनिक फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

    इस व्यवस्था में कई बार निर्वाचित सरकार और प्रशासन के बीच मतभेद सामने आए। मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश ने 12 फरवरी 1955 को पद से इस्तीफा दे दिया। उनके बाद गुरुमुख निहाल सिंह दिल्ली के दूसरे मुख्यमंत्री बने।

    यह विवाद केवल दो पदों के बीच का मतभेद नहीं था। इसके पीछे बड़ा संवैधानिक सवाल था—क्या राष्ट्रीय राजधानी को सामान्य राज्य की तरह चलाया जा सकता है या इसके प्रशासन पर केंद्र का नियंत्रण अधिक होना चाहिए?


    1956 में दिल्ली की विधानसभा क्यों खत्म कर दी गई?

    आजादी के बाद देश में राज्यों की सीमाओं और प्रशासनिक व्यवस्था के पुनर्गठन की प्रक्रिया चल रही थी। इसके लिए न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया गया।

    आयोग ने दिल्ली की स्थिति पर भी विचार किया। दिल्ली की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यहां संसद, राष्ट्रपति भवन, केंद्रीय मंत्रालय और देश के महत्वपूर्ण संस्थान स्थित थे। ऐसे में राजधानी के प्रशासन में केंद्र सरकार की विशेष भूमिका को महत्वपूर्ण माना गया।

    आयोग की सिफारिशों और केंद्र सरकार के फैसले के बाद राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 लागू हुआ। 1 नवंबर 1956 को दिल्ली का पार्ट-C राज्य का दर्जा समाप्त कर इसे केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया।

    इसके साथ ही दिल्ली की विधानसभा और मुख्यमंत्री की व्यवस्था खत्म हो गई। प्रशासन की जिम्मेदारी राष्ट्रपति के अधीन आ गई और केंद्र सरकार के माध्यम से दिल्ली का शासन चलाया जाने लगा।

    इस फैसले के साथ दिल्ली में जनता द्वारा चुनी गई विधानसभा का पहला अध्याय समाप्त हो गया।



    1966 में लौटा प्रतिनिधित्व, लेकिन अधिकार नहीं

    विधानसभा समाप्त होने के बाद भी दिल्ली में लोकतांत्रिक व्यवस्था की मांग खत्म नहीं हुई। दिल्ली की बढ़ती आबादी और प्रशासनिक जरूरतों के कारण स्थानीय लोगों को शासन में भागीदारी देने का दबाव बढ़ता रहा।

    इसी मांग को देखते हुए संसद ने दिल्ली प्रशासन अधिनियम, 1966 बनाया। इसके तहत दिल्ली में महानगर परिषद (Metropolitan Council) की स्थापना की गई। यह व्यवस्था 7 सितंबर 1966 से प्रभावी हुई।

    महानगर परिषद में 56 निर्वाचित और पांच मनोनीत सदस्य रखने का प्रावधान था। इसके साथ एक कार्यकारी परिषद भी बनाई गई, जिसका नेतृत्व मुख्य कार्यकारी पार्षद करते थे।

    लेकिन इस व्यवस्था की सबसे बड़ी सीमा यह थी कि महानगर परिषद के पास पूर्ण विधानसभा जैसे कानून बनाने के अधिकार नहीं थे। यह मुख्य रूप से चर्चा और सिफारिश करने वाली संस्था थी। अंतिम प्रशासनिक नियंत्रण केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के पास ही रहता था।

    इस तरह दिल्ली में जनता के प्रतिनिधियों की वापसी तो हुई, लेकिन उन्हें शासन चलाने के लिए पर्याप्त अधिकार नहीं मिले।


    1987 में बनी बालकृष्णन समिति, दिल्ली के लिए तैयार हुआ नया मॉडल

    समय के साथ दिल्ली की आबादी, आर्थिक गतिविधियां और प्रशासनिक जिम्मेदारियां तेजी से बढ़ीं। महानगर परिषद की सीमित शक्तियों के कारण स्थानीय स्तर पर जवाबदेही और निर्णय लेने की व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे।

    इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने 1987 में दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा के लिए समिति गठित की। इस समिति की अध्यक्षता पहले न्यायमूर्ति आर.एस. सरकारिया ने की और बाद में एस. बालकृष्णन ने इसकी जिम्मेदारी संभाली।

    समिति ने 14 दिसंबर 1989 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। उसकी प्रमुख सिफारिश थी कि दिल्ली को केंद्रशासित प्रदेश बनाए रखा जाए, लेकिन यहां विधानसभा और मंत्रिपरिषद की व्यवस्था होनी चाहिए।

    समिति का मानना था कि दिल्ली को स्थानीय विषयों पर निर्णय लेने के लिए निर्वाचित सरकार मिलनी चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय राजधानी की संवेदनशीलता के कारण पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था और जमीन जैसे विषय केंद्र के पास रहने चाहिए।

    इसी सिफारिश ने दिल्ली की वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था की नींव रखी।


    69वां संविधान संशोधन: दिल्ली को मिला राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का दर्जा

    बालकृष्णन समिति की सिफारिशों के आधार पर केंद्र सरकार ने दिल्ली के लिए नई संवैधानिक व्यवस्था तैयार की। संसद ने 1991 में संविधान का 69वां संशोधन पारित किया।

    इस संशोधन के जरिए संविधान में अनुच्छेद 239AA और 239AB जोड़े गए। इसके तहत केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (National Capital Territory यानी NCT) का नाम दिया गया और इसके प्रशासक को उपराज्यपाल (Lieutenant Governor) कहा जाने लगा।

    अनुच्छेद 239AA के तहत दिल्ली में विधानसभा और मंत्रिपरिषद की व्यवस्था की गई। दिल्ली विधानसभा को राज्य सूची और समवर्ती सूची के उन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार मिला, जो दिल्ली पर लागू होते हैं। हालांकि, तीन महत्वपूर्ण विषय—सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस और भूमि—उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर रखे गए।

    इसके साथ ही Government of National Capital Territory of Delhi Act, 1991 भी बनाया गया, जिसने दिल्ली की विधानसभा, मंत्रिपरिषद और प्रशासन के कामकाज का कानूनी ढांचा तय किया।

    यह संशोधन 1 फरवरी 1992 से प्रभावी हुआ। इसके बाद दिल्ली में चुनाव कराने और निर्वाचित सरकार की वापसी का रास्ता साफ हुआ।



    37 साल बाद 1993 में दिल्ली में लौटी निर्वाचित सरकार

    1956 में विधानसभा समाप्त होने के बाद दिल्ली में 1993 में दोबारा विधानसभा चुनाव हुए। इस तरह करीब 37 साल बाद राजधानी में फिर से जनता को अपनी सरकार चुनने का अवसर मिला।

    1993 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने जीत हासिल की और मदन लाल खुराना दिल्ली के मुख्यमंत्री बने। दिसंबर 1993 में उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

    इस तरह दिल्ली में विधानसभा और मुख्यमंत्री की वापसी हुई, लेकिन इस बार व्यवस्था पहले जैसी नहीं थी। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला था। उसके पास एक विशेष संवैधानिक ढांचा था, जिसमें निर्वाचित सरकार और केंद्र सरकार के बीच अधिकार बांटे गए थे।


    दिल्ली में मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल के अधिकार कैसे बंटे हैं?

    दिल्ली की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए संविधान का अनुच्छेद 239AA सबसे महत्वपूर्ण है। यही अनुच्छेद दिल्ली को विशेष संवैधानिक दर्जा देता है।

    दिल्ली विधानसभा को राज्य सूची और समवर्ती सूची के कई विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, परिवहन, स्थानीय सेवाएं और कई नागरिक सुविधाओं से जुड़े विषयों पर दिल्ली सरकार नीतियां और योजनाएं बना सकती है, बशर्ते वे संविधान और लागू कानूनों के दायरे में हों।

    लेकिन तीन महत्वपूर्ण विषय दिल्ली विधानसभा के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं:

    1. सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order): राजधानी में सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े विषय।

    2. पुलिस (Police): दिल्ली पुलिस और उससे संबंधित प्रशासनिक नियंत्रण।

    3. भूमि (Land): जमीन और उससे जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक विषय।

    इन विषयों पर केंद्र सरकार का नियंत्रण बना रहता है। दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है। वहीं जमीन से जुड़े मामलों में केंद्र सरकार और उसके अधीन संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है।

    दिल्ली में उपराज्यपाल राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रशासक हैं। संविधान और संबंधित कानूनों के तहत उन्हें कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियां दी गई हैं। मंत्रिपरिषद को उन विषयों पर उपराज्यपाल को सलाह देनी होती है, जिन पर दिल्ली विधानसभा कानून बना सकती है। कुछ मामलों में उपराज्यपाल को अपने विवेक से काम करने या राष्ट्रपति के समक्ष मामला भेजने का अधिकार भी है।

    यही व्यवस्था दिल्ली में कई बार मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों को लेकर विवाद का कारण बनी है।



    2014 में दिल्ली में लगा राष्ट्रपति शासन

    दिल्ली के राजनीतिक इतिहास में 2014 का साल भी महत्वपूर्ण रहा। दिसंबर 2013 में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी और अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने। लेकिन सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकी।

    14 फरवरी 2014 को जनलोकपाल विधेयक को विधानसभा में पेश करने को लेकर पैदा हुए विवाद के बाद अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

    इसके बाद 16 फरवरी 2014 को राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 239AB के तहत दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लागू करने का आदेश जारी किया। विधानसभा को तत्काल भंग करने के बजाय निलंबित अवस्था में रखा गया।

    फरवरी 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीतकर बड़ी सफलता हासिल की। राष्ट्रपति शासन का आदेश 14 फरवरी 2015 से वापस लिया गया और अरविंद केजरीवाल ने फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

    इस तरह लगभग एक साल तक दिल्ली में निर्वाचित सरकार के बजाय केंद्र के अधीन प्रशासनिक व्यवस्था रही।



    दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच अधिकारों की लड़ाई क्यों बढ़ी?

    दिल्ली में अधिकारों को लेकर विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा। अधिकारियों की नियुक्ति, तबादले, विजिलेंस और प्रशासनिक नियंत्रण जैसे मुद्दों पर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच कई बार टकराव हुआ।

    2018 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

    2018 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के अधिकारों पर महत्वपूर्ण फैसला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि उपराज्यपाल हर मामले में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने वाले प्रशासक नहीं हैं। उन्हें सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता के अनुसार काम करना चाहिए।

    अदालत ने यह भी कहा कि केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच संवैधानिक सहयोग और संतुलन जरूरी है। हर प्रशासनिक मतभेद को टकराव में बदलना उचित नहीं है।



    2023 में अधिकारियों के नियंत्रण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

    11 मई 2023 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने दिल्ली में सेवाओं यानी अधिकारियों के नियंत्रण से जुड़े विवाद पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

    अदालत ने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस और भूमि को छोड़कर दिल्ली सरकार को सेवाओं पर विधायी और कार्यकारी नियंत्रण प्राप्त है। इसका अर्थ था कि दिल्ली सरकार अपने प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति और तबादलों से जुड़े मामलों में अधिकार रखती है, जहां तक संविधान और कानून इसकी अनुमति देते हैं।

    लेकिन इस फैसले के आठ दिन बाद, 19 मई 2023 को केंद्र सरकार अध्यादेश लेकर आई। इसके जरिए अधिकारियों की नियुक्ति और तबादलों से जुड़े मामलों के लिए राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण बनाने का प्रावधान किया गया।

    बाद में संसद ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (संशोधन) अधिनियम, 2023 पारित किया। इस कानून ने अधिकारियों से जुड़े प्रशासनिक निर्णयों की व्यवस्था को नए सिरे से निर्धारित किया।

    इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि दिल्ली में चुनी हुई सरकार के अधिकारों की वास्तविक सीमा क्या है और राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासन में केंद्र की भूमिका कितनी होनी चाहिए।



    अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में कैसी है व्यवस्था?

    दिल्ली की संवैधानिक व्यवस्था को समझने के लिए अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी का उदाहरण भी उपयोगी है। वॉशिंगटन डीसी किसी अमेरिकी राज्य का हिस्सा नहीं है, बल्कि एक अलग संघीय जिला है। यहां व्हाइट हाउस और अमेरिकी संसद कैपिटल स्थित हैं।

    वॉशिंगटन डीसी में निर्वाचित मेयर और स्थानीय परिषद है, जो शहर के स्थानीय प्रशासन से जुड़े फैसले लेते हैं। लेकिन अमेरिकी कांग्रेस को यहां के कानूनों और बजट पर निगरानी तथा समीक्षा का अधिकार प्राप्त है।

    वॉशिंगटन डीसी के नागरिक अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में मतदान कर सकते हैं। उन्हें अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में एक ऐसा प्रतिनिधि भी मिलता है, जो बहस और समितियों में भाग ले सकता है, लेकिन सदन में सामान्य मतदान का पूरा अधिकार नहीं रखता। सीनेट में भी उनका कोई निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है।

    हालांकि, दिल्ली और वॉशिंगटन डीसी की संवैधानिक व्यवस्थाएं एक जैसी नहीं हैं। दोनों की तुलना से केवल इतना समझा जा सकता है कि कई देशों में राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासन को सामान्य राज्यों या प्रांतों से अलग रखा जाता है।



    दिल्ली-NCR कब बना और इसमें कौन-कौन से जिले शामिल हैं?

    दिल्ली पर बढ़ती आबादी, यातायात, आवास और बुनियादी सुविधाओं का दबाव कम करने के लिए आसपास के शहरों के योजनाबद्ध विकास की जरूरत महसूस की गई। इसी उद्देश्य से संसद ने 1985 में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना बोर्ड अधिनियम बनाया और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना बोर्ड (NCRPB) की स्थापना की।

    इसका उद्देश्य दिल्ली के साथ आसपास के क्षेत्रों का संतुलित विकास करना था, ताकि रोजगार, आवास, उद्योग और परिवहन जैसी सुविधाओं का विस्तार केवल दिल्ली तक सीमित न रहे।

    राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पूरी दिल्ली के अलावा हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ जिले शामिल हैं।

    NCR में राज्यों के कितने जिले शामिल हैं?

    राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना बोर्ड की उपलब्ध जिला सूची के अनुसार NCR में दिल्ली के अलावा तीन राज्यों के कुल 24 जिले शामिल हैं।

    राज्यNCR में शामिल जिले
    हरियाणा14
    उत्तर प्रदेश8
    राजस्थान2
    कुल24

    हरियाणा के 14 जिले हैं—फरीदाबाद, गुरुग्राम, नूंह, रोहतक, सोनीपत, रेवाड़ी, झज्जर, पानीपत, पलवल, भिवानी, चरखी दादरी, महेंद्रगढ़, जींद और करनाल।

    उत्तर प्रदेश के आठ जिले हैं—मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बुलंदशहर, बागपत, हापुड़, शामली और मुजफ्फरनगर।

    राजस्थान के दो जिले हैं—अलवर और भरतपुर।

    इनके अतिरिक्त पूरा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (NCT) भी NCR का हिस्सा है। इस प्रकार दिल्ली को मिलाकर NCR में चार प्रशासनिक इकाइयों के क्षेत्र शामिल होते हैं। 



    दिल्ली के 70 साल की कहानी का सबसे बड़ा सवाल

    दिल्ली का इतिहास बताता है कि राजधानी की प्रशासनिक व्यवस्था हमेशा से एक बहस का विषय रही है। 1952 में जनता ने पहली बार विधानसभा चुनी, लेकिन 1956 में यह व्यवस्था समाप्त कर दी गई। 1966 में महानगर परिषद के रूप में सीमित प्रतिनिधित्व लौटा और 1993 में विधानसभा के साथ निर्वाचित सरकार फिर स्थापित हुई।

    आज दिल्ली में मुख्यमंत्री, विधानसभा और मंत्रिपरिषद हैं, लेकिन पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था और जमीन जैसे विषय केंद्र के अधीन हैं। यही वजह है कि दिल्ली की सरकार को कई बार ऐसे मामलों में सीमित अधिकारों के साथ काम करना पड़ता है, जिनका सीधा असर राजधानी के नागरिकों पर पड़ता है।

    एक ओर दिल्ली पूरे देश की राजधानी है, जहां राष्ट्रीय सुरक्षा और केंद्रीय संस्थानों की जिम्मेदारी है। दूसरी ओर यहां करोड़ों लोगों का दैनिक जीवन, स्थानीय सेवाएं और नागरिक सुविधाएं भी हैं, जिनके लिए जवाबदेह प्रशासन जरूरी है।

    इसलिए दिल्ली की संवैधानिक व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है—राष्ट्रीय राजधानी की विशेष जरूरतों और स्थानीय लोकतंत्र की अपेक्षाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?

    दिल्ली के 70 साल का इतिहास केवल केंद्रशासित प्रदेश बनने की कहानी नहीं है। यह राजधानी में लोकतंत्र, अधिकारों और सत्ता के संतुलन की लगातार चलती आ रही बहस की कहानी भी है।

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