बिश्नोई समाज ने भारत के विभिन्न राज्यों में 5 सितंबर को खेजड़ली बलिदान दिवस मनाया
नई दिल्ली : सिर सांटे रुंख रहे तो भी सस्तो जाण अर्थात अगर सिर कटाकर भी पेड़ बच जाए तो भी यह सौदा बहुत सस्ता है। इस विचारधारा पर चलते हुए वर्षों पूर्व हरे पेड़ों को कटने से बचाने के लिए बिश्नोई समाज के 363 लोगों ने अपना बलिदान दे दिया था जो कि विश्व भर में एक अनूठा उदाहरण है। यह घटना राजस्थान में जोधुपर जिले के खेजड़ली गांव में महाराजा अभय सिंह के राज्य काल में 1730 ई. को हुई थी। तभी से बिश्नोई समाज द्वारा यह दिन बलिदान दिवस के रूप में मनाया जाता है।
5 सितंबर को यह बलिदान दिवस मनाया जाता है। पर्यावरण प्रेमी अनुराग बिश्नोई ने बताया कि बिश्नोई धर्म प्रवर्तक गुरू जंभेश्वर भगवान जी ने आज से कई वर्षो पूर्व पर्यावरण संरक्षण के लिए संदेश दिया था। उनके द्वारा प्रणित 29 नियमों में नियम संख्या 20 में अपने शिष्यों व अनुयायियों को हरे वृक्षों, वन्य प्राणियों व प्रकृति की रक्षा का संदेश दिया है। इसी नियम पर चलते हुए बिश्रोई समाज के 363 लोगों ने अपना बलिदान दिया था, बलिदान दिवस के संदर्भ में उन्होंने बताया कि जोधपुर के महाराजा अभय सिंह के राज्य काल में महराण गढ़ किले मे फूल महल नाम का राजभवन बनाया जा रहा था।महल के लिए लकड़ी की आवश्यकता पड़ी।वहां से कुछ ही दूर खेजड़ली गांव में वृक्षों की बहुतायत थी।महाराज का हुकम लेकर लकड़ी काटने के लिए राजा के सिपाहसलार खेजड़ली गांव में पहुंचे।
सिपाहियों ने खजड़ली गांव में पहुंचकर उसने लगे पेड़ को काटना शुरू कर दिया। इस पर अमृता देवी बिश्रोई कुल्हाड़ी की आवाज सुनकर घर से बाहर आई। उसने राजा के सिपाहियों को पेड़ काटने से रोका एवं कहा कि बिश्नोई धर्म के नियमों के मुताबिक पेड़ काटना पाप है।यह हमें हमारे प्राणों से भी प्रिय हैं।लेकिन जब सिपाहियों ने पेड़ काटना बंद नहीं किया तो अमृता देवी अपनी जान की परवाह न करते हुए पेड़ से चिपक कर खड़ी हो गई। तभी से देश में पहले चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई, सिपाहियों ने कुल्हाड़ी चलाना बंद नहीं किया एवं अमृता देवी का अंग-अंग काट कर फेंक दिया। अपनी मां का बलिदान देखकर उसकी तीन पुत्रियों ने भी इसी प्रकार बलिदान दे दिया।
इस स्थान पर बाद में पेड़ों को बचाते हुए एक-एक कर 363 बिश्नोई शहीद हो गए जिनमें 71 महिलाएं व 292 पुरुष थे। जब यह सूचना महाराज को मिली तो उन्होंने आकर बिश्नोई समाज से माफी मांगी। अनुराग बिश्नोई ने कहा इस बलिदान दिवस पर हर वर्ष खेजडली गांव में मेला लगता है। समाज के लोग इस मेले में शिरकत कर बलिदानियों को नमन करते हैं एवं वृक्षों को बचाने का संकल्प लेते हैं। उन्होंने कहा कि मानव के समक्ष सबसे बड़ी समस्या पर्यावरण प्रदूषण की है। जीवन जीने के लिए हमें श्वास चाहिए। वृक्ष हमें प्राण वायु देता व इसके बदले में हमसे कुछ नहीं मांगता।उन्होंने बताया कि हम सभी को पर्यावरण संरक्षण करना चाहिए और उसके साथ बात हमें पेड़ पौधे लगाने चाहिए क्योंकि इन्हीं पेड़ पौधों से हमारे जीवन की हर सांस चलती है,अनुराग विश्नोई ने भारत सरकार से निवेदन करते हुए कहा की हम पुनः यूनेस्को से मांग करते हैं |
कि खेजड़ली शहीद स्थल को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जाए और उसके साथ साथ 5 जून को जो हम पर्यावरण दिवस मनाते हैं वह आज 5 सितंबर के दिन जिस दिन विश्व का पहला चिपको आंदोलन हुआ जिसमें 363 लोगों ने बलिदान दिया इस दिन को पर्यावरण दिवस मनाया जाए।
खेजड़ली बलिदान दिवस पर हर साल की तरह इस साल भी अनुराग विश्नोई ने अपने परिवार के साथ और सुनील यादव जी,अनूप त्रिपाठी जी, मनमोहन त्रिपाठी जी,के साथ मिलकर पौधारोपण किया जिसमें आम और बेल का पोधा रोपण किया गया,सुनील यादव जी ने कहा कि करोना काल में हमें पर्यावरण की जो महत्वता है उसका स्मरण करा दिया है उसके बाद भी अगर हम लोग पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य नहीं करेंगे यह पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्य नहीं करेंगे तो आने वाला समय बहुत ही दुखदाई होगा, बलिदान दिवस के अवसर पर अनूप त्रिपाठी जी द्वारा भी कहा गया कि हम सभी को अपने खुशी के शुभ अवसर पर भी पौधारोपण करना चाहिए चाहे वह हमारा बच्चों का जन्मदिन हो क्युकी पौधारोपण हमारे जीवन में बहुत ही महत्व रखता है |
इसी के साथ साथ मनमोहन त्रिपाठी जी द्वारा भी कहा गया की हमें इस दुनिया में जन्म तो हमारी मां देती है लेकिन पहली स्वास हमें प्रकृति से ही मिलती है अतः हमें पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य जरूर करना चाहिए,और पूरे देशवासियों से अपील की गई कि वह अपने बच्चों को लेकर पर्यावरण के क्षेत्र में कुछ न कुछ कार्य अवश्य करें जिससे आने वाले समय में हमारे बच्चे शुद्ध प्राणवायु ले सकें।
अनुराग विश्नोई ने बताया कि वह राष्ट्रीय जंगल एवं प्रकृति बचाओ अभियान भारत के साथ मिलकर अलग अलग राज्य में हो रहे विकास के नाम पर जो विनाश की लीला चल रही है उसको रोकने का कार्य करते हैं क्योंकि कहीं भी अगर विकास करने की बात होती है तो बेजुबान पशु पक्षियों के आवास को बिना कुछ सोचे समझे उजाड़ दिया जाता है कहीं भी जंगलों को काट दिया जाता है जिससे बेजुबान पशु पक्षियों का आवास खत्म हो जाता है पर्यावरण ने हमें बहुत कुछ दिया है शायद हम पूरी जिंदगी भी अगर पर्यावरण को समर्पित कर दें तो भी हम पर्यावरण के दिए हुए उपहार का बदला नहीं उतार सकते हैं अतः हम क्यों ना पर्यावरण के क्षेत्र में प्रकृति को बचाने का कार्य करें जल जंगल और जमीन को बचाने का कार्य करें इन्हीं बातों के साथ-साथ अनुराग बिश्नोई ने बताया कि सभी देशवासी एक प्रण लें कि हम पर्यावरण को बचाने में अपना योगदान अवश्य देंगे


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