गोधन में भाइयों को क्यों दिया जाता है मरने का 'शाप', जानिए क्या है गोधन की अनोखी परंपरा
We News 24 Digital»रिपोर्टिंग सूत्र / कविता चौधरी
नई दिल्ली : भारत एक संस्कारो और रीती रिवाजो को मानने वाला एक हिन्दू सनातनी देश है यंहा प्राचीन काल से ही अलग-अलग जाती समुदाय के द्वारा अपने -अपने रीती रिवाजो के अनुसार अलग- अलग राज्यों में सभी पर्व और त्योहार मनाने की अलग-अलग परंपरा है, ऐसा ही एक परम्परा है जो दिवाली के बाद भैयादूज के दिन बिहार और झारखंड में भाइयों की लम्बी उम्र और मंगलकामना के लिए बहनों के द्वारा गोधन कूटने की अनोखी परंपरा है. कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाए जाने वाले भैयादूज पर्व को बिहार और झारखंड में 'गोधन' के नाम से जाना जाता है. इस दिन बहनें अपने भाइयों को पहले मरने का श्राप देती फिर उनके मंगलकामना करती हैं. ऐसी मान्यता है कि भाइयों को इस श्राप से मृत्यु का डर नहीं होता.
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भाइयों को जमकर कोसा जाता है
गोधन के मौके पर बिहार और झारखंड में बहन द्वारा भाइयों को जमकर कोसा जाता है और गालियां भी दी जाती है. यहां तक की भाइयों के मृत्यु का भी शाप दिया जाता है. इस क्रम में बहनें अपनी जीभ में 'रेंगनी' के कांटों को चुभाती हैं. इस क्रिया को 'शापना' भी कहा जाता है.
यम और यमी की प्रतिमा बनाई जाती है
इस पर्व में कई महिलाएं एक ही स्थान पर जमा होकर गोधन कूटती हैं. गोधन पर्व सभी उम्र की महिलाएं करती हैं. इस दिन महिलाओं द्वारा मोहल्ले में एक घर के बाहर सामूहिक रूप से गोबर से चौकोर आकृति बनाई जाती है, जिसमें गोबर से ही यम और यमी की प्रतिमा बनाई जाती है. इसके अलावा इस चौकोर आकृति में सांप, बिच्छु आदि की आकृतियां भी बनाई जाती हैं. इसके बाद वहां एकत्र हुई महिलाएं सबसे पहले इसकी पूजा करती हैं और फिर सभी को डंडे से कूटा जाता है.
जीभ में चुभाकर भाइयों को कोसा
गोधन पर्व के पूजा के दौरान इस आकृति के पास ईंट, नारियल, चना, सुपारी और वह कांटा जिसे अपने जीभ में चुभाकर भाइयों को कोसा जाता है, उसे भी रख दिया जाता है. इसी अनोखी परंपरा को ही गोधन कूटना कहा जाता है. गोधन कूटने के दौरान महिलाएं साथ में मिलकर गीत और भजन भी गाती हैं.
बहन को उपहार देने की परंपरा
बाद में इस कूटे हुए चना को बहनें वहां से निकाल लेती हैं और इसे अपने-अपने भाइयों को तिलक लगाकर खिलाती हैं. भाइयों द्वारा इस दिन बहन को उपहार देने की भी परंपरा है. ऐसी मान्यता है कि यह परंपरा काफी पुरानी है, जिसे पूरी आस्था और परंपरानुसार मनाया जाता है.
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