क्यों भारत में स्लीपर बसें बनती जा रही हैं आग का गोला? सुरक्षा के नाम पर हो रहा खिलवाड़, कब जागेगी सरकार?
We News 24 : डिजिटल डेस्क »✍️
वरिष्ठ संवाददाता दीपक कुमार की रिपोर्ट)
नई दिल्ली : "करवट लेते ही आग की लपटों ने घेर लिया... बस के अंदर चीखों का अंधेरा... बचने का रास्ता नहीं..." ये शब्द हैं 16 दिसंबर की उस काली रात के एक चमत्कारिक बचे यात्री के, जब आगरा एक्सप्रेसवे पर कोहरे में टकराईं और फिर जलीं स्लीपर बसें। 18 लोगों की जिंदगी का दीपक उस रात हमेशा के लिए बुझ गया। महज छह दिन बाद, 22 दिसंबर को, फिर आगरा एक्सप्रेसवे पर ही नेपाल जा रही एक और स्लीपर बस आग का गोला बन गई। किस्मत ने इस बार जानें बख्श दीं, लेकिन सवाल यह है: अगली बार कब? कहाँ?
यह कोई अकेली घटना नहीं। "अरे रामा! एम जीवंतला काडू!" (हे राम! मुझे जिंदा निकालो!) – यह चीख थी 24 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश के कुरनूल में जलती बस के एक यात्री की, जहाँ 20 लोग फिर कभी नहीं जागे। इससे पहले, राजस्थान में जैसलमेर से जोधपुर का सफर तय कर रही स्लीपर बस ने 26 परिवारों को अनंत दुख में छोड़ दिया। आखिर "ई बसलु एंती सीगा टिंडेस्तुन्नायी?" (ये बसें अंत क्यों दे रही हैं?) – यह सवाल हर पीड़ित के परिवार की जुबान पर है।
कस्टमाइजेशन का काला बाजार: 'जुगाड़' पर टिकी सुविधा
हमारी टीम ने दिल्ली-एनसीआर के कई बस डिपो और कस्टमाइजेशन वर्कशॉप्स का गुप्त दौरा किया। जो तस्वीर उभरी, वह डरावनी है। OEM (मूल निर्माता) से नई आई बसों को RTO के पास चेक कराने के बाद ही 'जुगाड़' का दौर शुरू होता है। एक वर्कशॉप मैनेजर, नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, "साहब, ग्राहक चाहता है ज्यादा सीट, ज्यादा लाइट, पंखे, चार्जिंग पॉइंट। हम लगा देते हैं। वायरिंग? जो सस्ता और तुरंत मिले। फायर नॉर्म्स? बस में दो एक्सटिंग्विशर टांग देते हैं, भरे हों या खाली।"
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यहीं से शुरू होता है 'दाव' में 'घाव'। इंडियन इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन के टेक्नोलॉजी चेयरमैन जेड रहमान साफ कहते हैं, "OEM से निकलने पर बस की जांच होती है, लेकिन कस्टमाइजेशन के बाद कोई दोबारा चेक नहीं। यह बड़ी चूक है। सरकार को नया नियम लाकर इस कस्टमाइजेशन के बाद की अनिवार्य जांच सुनिश्चित करनी चाहिए।"
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सोते-सोते सुलगता सच: मानकों की नींद, लापरवाही की जागीर
AIM रोड सेफ्टी ट्रेनिंग अकादमी के ट्रेनिंग हेड सुरिंदर शर्मा बताते हैं कि अवैध बदलावों की फेहरिस्त लंबी है:
कच्ची वायरिंग: AC, लाइटिंग के लिए नकली या कम ग्रेड के तार, जो जल्दी गर्म होकर शॉर्ट सर्किट करते हैं।
ज्वलनशील सामग्री: सस्ते फोम, पर्दे, कंबल जो आग को पलभर में फैला देते हैं।
बंद निकास: यात्रियों की भीड़ बढ़ाने के चक्कर में इमरजेंसी गेट्स ब्लॉक या उनके पास सीटें लगा दी जाती हैं। बस के शीशे तोड़ने वाले हथौड़े गायब।
बेकार फायर सिस्टम: AIS-134 मानक के तहत अनिवार्य फायर डिटेक्शन और सप्रेशन सिस्टम नहीं लगाए जाते। एक्सटिंग्विशर अक्सर प्रतीकात्मक।
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सरकारी जवाबदेही: कागजी दिशा-निर्देश या जमीनी कार्रवाई?
यह सवाल भी उतना ही अहम है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के पास AIS-052 (बस बॉडी कोड), AIS-119 (स्लीपर बस कोड) जैसे मानक मौजूद हैं। लेकिन जमीन पर उनकी धज्जियां उड़ती दिख रही हैं। राज्यों के RTO विभागों पर निगरानी और नियमों को लागू कराने का दबाव पर्याप्त नहीं दिखता। क्या प्रिवेंटिव चेकिंग के बजाय सिर्फ हादसों के बाद 'जांच समिति' बैठाना काफी है?
जागने का वक्त
यह सिर्फ 'दुर्घटना' नहीं, एक 'मानव-निर्मित त्रासदी' है। एक तरफ यात्री की नींद में सफर करने की सहूलियत, दूसरी तरफ ऑपरेटरों का मुनाफे का लालच और तीसरी तरफ नियामकों की ऊंघ। इस त्रिकोण ने स्लीपर बसों को चलती अग्निकुंड बना दिया है। "इन हादसों के बाद अक्सर कहा जाता है 'गाड़ी चलाने वाले को सजा मिलेगी'। लेकिन सवाल है, गाड़ी को जलने से बचाने वाली व्यवस्था कब तक सोती रहेगी?" जरूरत है एक सख्त, पारदर्शी और निरंतर ऑडिट व्यवस्था की, ताकि हर स्लीपर बस सच में 'सुरक्षित नींद' की गारंटी बन सके।
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