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    "गलत व्याख्या हो रही है": अरावली की परिभाषा पर SC ने खुद के आदेश पर लगाया स्थगन, नई समिति बनेगी

     

    "गलत व्याख्या हो रही है": अरावली की परिभाषा पर SC ने खुद के आदेश पर लगाया स्थगन, नई समिति बनेगी

    We News 24 : डिजिटल डेस्क »

    ✍️रिपोर्ट: अमित शर्मा, वी न्यूज 24, नई दिल्ली

    तारीख: 30 दिसंबर 2024


    नई दिल्ली, सोमवार। सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की ‘नई परिभाषा’ पर पिछले महीने जारी अपने ही आदेश पर सोमवार को रोक लगा दी। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अवकाशकालीन पीठ ने यह स्थगन आदेश पारित किया, जिसके बाद पर्यावरण कार्यकर्ताओं और वैज्ञानिकों ने राहत की साँस ली है। उनका आरोप था कि नवंबर का आदेश इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के बड़े हिस्सों को अवैध खनन के लिए खोल सकता था।

    पीठ ने कहा, “हम समिति की सिफारिशों और इस न्यायालय के पिछले निर्देशों को तब तक स्थगित रखना आवश्यक समझते हैं, जब तक कि एक नई समिति गठित नहीं हो जाती।” अदालत ने केंद्र सरकार और चार संबंधित राज्यों – हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और दिल्ली – को नोटिस जारी किए हैं, और एक स्वतंत्र विशेषज्ञ पैनल गठित करने का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई 21 जनवरी तय की गई है।



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    पृष्ठभूमि: क्या था नवंबर का आदेश?

    गत नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि अरावली क्षेत्र में किसी भी नई खनन गतिविधि की अनुमति देने से पहले ‘सतत खनन’ की एक व्यापक योजना तैयार करे। हालाँकि, इस आदेश के बाद केंद्र ने अरावली की एक नई परिभाषा अधिसूचित की, जिस पर विवाद खड़ा हो गया। पर्यावरणविदों और भूवैज्ञानिकों ने आरोप लगाया कि इस परिभाषा को बिना पर्याप्त मूल्यांकन या जन परामर्श के तैयार किया गया है, जिससे हरियाणा, राजस्थान व गुजरात में अरावली के विशाल भूभाग खनन की जद में आ सकते हैं।

    आज की सुनवाई: “गलत व्याख्या हो रही है”

    आज सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि केंद्र ने नवंबर के आदेश के अनुसार योजना तैयार कर ली है और अदालत ने उसे “स्वीकार” कर लिया था। इस पर CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया, “हमारा मानना है कि समिति की रिपोर्ट और अदालत की टिप्पणियों की गलत व्याख्या की जा रही है। कुछ स्पष्टीकरण आवश्यक है। कार्यान्वयन से पहले एक निष्पक्ष, तटस्थ और स्वतंत्र विशेषज्ध की राय


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     ली जानी चाहिए।”

    CJI ने आगे टिप्पणी करते हुए कहा कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि क्या नई परिभाषा ने “गैर-अरावली” क्षेत्रों के दायरे को इतना व्यापक कर दिया है कि उससे अनियमित खनन को बढ़ावा मिल रहा है। “स्पष्ट मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए यह कदम आवश्यक है,” उन्होंने कहा।

    स्थानीय प्रतिक्रिया: “जीत है पर्यावरण की”

    हरियाणा के अरावली इलाके के ग्रामीणों और कार्यकर्ताओं ने इस आदेश का स्वागत किया है। मेवात के एक सामाजिक कार्यकर्ता इरशाद अहमद ने वी न्यूज 24 से बातचीत में कहा, “ये कोर्ट का फैसला सही दिशा में उठाया गया कदम है। अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं, हमारी जीवनरेखा है। इसे खनन के हवाले करना सबके लिए आफत होता।”

    आगे की राह

    अब नई गठित की जाने वाली विशेषज्ञ समिति अरावली की भूवैज्ञानिक व पारिस्थितिक सीमाओं पर अपनी रिपोर्ट देगी। इसके साथ ही चारों राज्यों और केंद्र को भी अपना पक्ष रखना होगा। 21 जनवरी तक सभी पक्षों से जवाब माँगे गए हैं।

    विश्लेषण: सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप दर्शाता है कि पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाते समय वैज्ञानिक आधार और पारदर्शिता कितनी महत्त्वपूर्ण है। अरावली का मामला सिर्फ कानूनी बहस नहीं, बल्कि दिल्ली-एनसीआर की जलवायु, जल संरक्षण और जैवविविधता से सीधा जुड़ा है।




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