पश्चिम बंगाल: पीरजादाओं की सियासी 'पंगा' में हुमायूं कबीर का नया 'दाव'... क्या बदलेगा 'गेम'?
We News 24 : डिजिटल डेस्क »✍️रिपोर्ट: शौमिक बसु
वी न्यूज 24, कोलकाता | 22 दिसंबर 2025
मुर्शिदाबाद। बिहार के बाद अब रंगा बंगाल। आने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर राज्य की राजनीति गरमा गई है। ताजा सियासी हलचल में टीएमसी से बाहर हुए विधायक हुमायूं कबीर ने नई पार्टी 'जनता उन्नयन पार्टी' बनाकर सबको चौंका दिया है। उनका कहना है, "टीएमC-विरोधी और BJP-विरोधी ताकतें एक हो जाएं, तो दीदी की सरकार बदल सकती है।" लेकिन असल सवाल ये है कि क्या मुस्लिम वोटों के 'पीर' बनने की कोशिश में लगे हुमायूं, बंगाल के पहले से मौजूद दो बड़े पीरजादाओं - कांग्रेस के खोबायेब अमीन और TMC के कासिम सिद्दीकी - की 'दुकान' चौपट कर पाएंगे?
'बाबरी मस्जिद' से चुनावी मैदान तक हुमायूं कबीर का सफर
हुमायूं कबीर पहले ही मुर्शिदाबाद में 'बाबरी मस्जिद' बनाने के ऐलान से सुर्खियां बटोर चुके हैं। अब उन्होंने सीधे तौर पर कहा है कि उनका निशाना अल्पसंख्यक वोटरों को एकजुट करना है। उनका दावा है, "कम से कम 90 सीट जीतेंगे, तभी नई सरकार बनाने में अहम भूमिका निभा पाएंगे। वरना मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद का सपना अधूरा रह जाएगा।" सियासी गलियारों में चर्चा है कि हुमायूं के इस कदम से TMC के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध पड़ सकती है, खासकर उत्तर बंगाल के जिलों में।
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दो पीरजादा, दो दल: किसकी चलेगी 'बाजी'?
बंगाल की सियासत में पीरजादाओं की एंट्री नई नहीं है। इस साल 31 मई को ही सोशल एक्टिविस्ट पीरजादा खोबायेब अमीन ने कांग्रेस का दामन थामा। अमीन का परिवार पश्चिम बंगाल, ओडिशा और त्रिपुरा में धर्म व शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए मशहूर है। उधर, TMC ने भी बाजी पलटते हुए फुरफुरा शरीफ के पीरजादा कासिम सिद्दीकी को पार्टी का महासचिव बना दिया। यह कदम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा के ध्रुवीकरण और ISF के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए उठाया है।
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कासिम सिद्दीकी पर ममता का भरोसा, क्योंकि...
कासिम सिद्दीकी को TMC में बड़ी भूमिका देना कोई इत्तेफाक नहीं है। दरअसल, 2021 के विधानसभा चुनाव में मौलवी अब्बास सिद्दीकी की पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) ने TMC के गढ़ दक्षिण 24 परगना की भांगर सीट जीतकर तहलका मचा दिया था। 2023 के पंचायत चुनावों में भी ISF ने TMC के दक्षिण बंगाल के गढ़ों में करीब 400 सीटें जीतीं। कासिम, अब्बास और नौशाद सिद्दीकी के करीबी रिश्तेदार हैं। ऐसे में ममता का भरोसा है कि कासिम TMC के मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत कर सकते हैं।
'एजेंट' के आरोप और सियासी समीकरण
हुमायूं कबीर पर विपक्षी दल 'एजेंट' होने और 'मिलीभगत' के आरोप लगा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वह अपने नाम से मैदान में टिक पाएंगे? जानकार मानते हैं कि हुमायूं का नया दाव मुस्लिम बहुल इलाकों में TMC और कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है। वहीं, भाजपा भी बांग्लादेश में हिंसा, मुर्शिदाबाद सांप्रदायिक हिंसा और शर्मिष्ठा पानोली जैसे मुद्दों पर हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करने में जुटी है।
अंत में...
साफ है कि बंगाल में चुनावी 'करीबी' से पहले ही सभी दल ध्रुवीकरण की 'तैयारी' में जुट गए हैं। हुमायूं कबीर के रूप में एक नए 'पीरजादा' के मैदान में उतरने से चुनावी 'फिजा' और 'गरम' होगी। अब देखना है कि बंगाल की 'रंगीन' सियासत में ये नया 'खिलाड़ी' किसकी 'गेंद' कैसे 'बिगाड़ता' है।
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