क्या खत्म हो रही है डॉलर की बादशाहत? ब्रिक्स और चीन-रूस की चाल से अमेरिका में खलबली
डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों से लेकर ब्रिक्स की नई मुद्रा तक, जानिए कैसे ‘डी-डॉलराइजेशन’ बदल सकता है दुनिया की ताकत का संतुलन
We News 24 : डिजिटल डेस्क »✍️रिपोर्ट: महेन्द्र सिंह | नई दिल्ली
नई दिल्ली। अमेरिका दशकों से दुनिया का सबसे ताकतवर और समृद्ध देश बना हुआ है। 1990 में सोवियत संघ के विघटन के बाद करीब तीन दशक तक वैश्विक मंच पर उसे कोई बड़ी चुनौती नहीं मिली। इसकी सबसे बड़ी वजह रही — अमेरिकी डॉलर का वैश्विक प्रभुत्व।
आज भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विदेशी मुद्रा भंडार और वैश्विक वित्तीय लेन-देन में डॉलर की बादशाहत कायम है, लेकिन बीते कुछ वर्षों में तस्वीर तेजी से बदल रही है। चीन, भारत, रूस और ब्राजील जैसे देश अब डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। इसी प्रक्रिया को कहा जा रहा है — डी-डॉलराइजेशन।
क्या है डी-डॉलराइजेशन?
डी-डॉलराइजेशन का मतलब है वैश्विक व्यापार और लेन-देन में अमेरिकी डॉलर की जगह युआन, रूबल, रुपया या सोने जैसी अन्य मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ाना। इसका मकसद है — अमेरिका की आर्थिक पकड़ और प्रतिबंधों से बचना और अपनी आर्थिक संप्रभुता को मजबूत करना।
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ब्रिक्स बन रहा है बड़ी चुनौती
आज ब्रिक्स (भारत, चीन, रूस, ब्राजील और अन्य देश)
- दुनिया की करीब 40% अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है
- वैश्विक व्यापार में 26% हिस्सेदारी रखता है
ब्रिक्स देश अब आपस में अपनी-अपनी मुद्राओं में व्यापार बढ़ा रहे हैं और यहां तक कि डॉलर से अलग एक साझा मुद्रा लाने पर भी विचार चल रहा है।
अमेरिका में क्यों बढ़ी बेचैनी?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही साफ कर चुके हैं कि अगर कोई देश डॉलर की बादशाहत को चुनौती देता है तो उस पर टैरिफ और आर्थिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। अमेरिका को डर है कि अगर डॉलर की पकड़ कमजोर हुई तो उसकी आर्थिक और भू-राजनीतिक ताकत भी घट जाएगी।
दरअसल डॉलर सिर्फ एक मुद्रा नहीं, बल्कि अमेरिका का सबसे ताकतवर हथियार है, जिसके जरिए वह दुनिया के देशों पर प्रतिबंध लगाता है और अपनी शर्तें मनवाता है।
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कैसे बना डॉलर दुनिया की सबसे ताकतवर मुद्रा?
- 1920 का दशक: डॉलर ने ब्रिटेन के पाउंड को पीछे छोड़ना शुरू किया
- 1944: ब्रेटन वुड्स समझौते के बाद डॉलर वैश्विक व्यापार की मुख्य मुद्रा बना
- 1971: अमेरिका ने डॉलर को सोने से अलग कर दिया
- 2007-08: वैश्विक मंदी में भी डॉलर सुरक्षित मुद्रा बना रहा
अब क्यों बदल रही है दुनिया?
आज कई देश यह महसूस कर रहे हैं कि डॉलर पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता उन्हें अमेरिका के राजनीतिक दबाव में कमजोर बना देती है। इसलिए:
- चीन कई देशों से युआन में व्यापार कर रहा है
- रूस प्रतिबंधों के बाद रूबल में लेन-देन बढ़ा रहा है
- भारत भी कुछ देशों से रुपये में व्यापार की शुरुआत कर चुका है
- केंद्रीय बैंक सोना खरीदकर अपने भंडार में विविधता ला रहे हैं
वेनेजुएला का उदाहरण
वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है — करीब 303 अरब बैरल। चीन ने उसे 10 अरब डॉलर का कर्ज दे रखा था और बदले में तेल ले रहा था। लेकिन अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद वहां का तेल कारोबार फिर से डॉलर आधारित सिस्टम में चला गया। यह दिखाता है कि अमेरिका कैसे डॉलर का इस्तेमाल रणनीतिक हथियार की तरह करता है।
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विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
राजनीतिक विश्लेषक ओमप्रकाश पासवान का कहना है:
“आज कई देश डॉलर पर निर्भर नहीं रहना चाहते। रूस, चीन और ब्रिक्स देश अपनी मुद्राओं में व्यापार कर रहे हैं। इससे अमेरिका की वैश्विक पकड़ धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है। यह बदलाव धीरे होगा, लेकिन लंबे समय में दुनिया के लिए संतुलन पैदा करेगा।”
वहीं अर्थशास्त्री मीना धानिया मानती हैं कि:
“डॉलर आज भी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन पहली बार उसकी बादशाहत को गंभीर चुनौती मिल रही है।”
क्या खत्म हो जाएगी डॉलर की बादशाहत?
फिलहाल डॉलर का प्रभुत्व जल्दी खत्म होना मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि अब दुनिया एक नई आर्थिक व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, जहां ताकत सिर्फ एक देश के हाथ में नहीं रहेगी।
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