🌞🪁 महरौली में गढ़वाल समाज की उत्तरायणी मकरैंण धूम: उत्तराखंड की लोक धुनों से गूंजा दिल्ली का कोना!
We News 24 : डिजिटल डेस्क »✍️वरिष्ट संवाददाता: दीपक कुमार
नई दिल्ली, 14 जनवरी 2026 :- दक्षिण दिल्ली के महरौली इलाके में आज मकर संक्रांति का पर्व उत्तरायणी के रूप में गढ़वाल समाज ने बड़ी धूमधाम से मनाया। हजारों की तादाद में लोग इकट्ठे हुए और उत्तराखंड की पारंपरिक लोक संगीत व नृत्य के कार्यक्रमों ने पूरे माहौल को पहाड़ी रंग में रंग दिया। सूर्य के उत्तरायण होने की खुशी में पतंगबाजी से लेकर दान-पुण्य तक की रस्में निभाई गईं, जो दिल्ली में उत्तराखंडी संस्कृति की झलक दिखाती रहीं।
कार्यक्रम की शुरुआत सुबह से ही हो गई थी, जहां समाज के लोग महरौली के एक बड़े मैदान में जमा हुए। यहां उत्तराखंड के लोक गीतों जैसे 'बेड़ू पाको बारो मासा' की धुन पर महिलाओं और युवाओं ने पारंपरिक नृत्य पेश किए। बच्चों ने पतंग उड़ाईं और बड़े-बुजुर्गों ने तिल-गुड़ बांटकर एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं। आयोजकों ने बताया कि यह आयोजन हर साल होता है,
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उत्तराखंड में मकर संक्रांति को उत्तरायणी क्यों कहते हैं और क्यों मनाते हैं? उत्तराखंड, जिसे देवभूमि कहा जाता है, में यह पर्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने का प्रतीक है। यहां इसे उत्तरायणी, मकरैंण, खिचड़ी संगरांद या घुघुतिया त्योहार के नाम से जाना जाता है। वैदिक काल से ही यह त्योहार ऋतु परिवर्तन से जुड़ा है। सूर्य जब धनु राशि से निकलकर मकर राशि में आता है, तो उत्तरायण शुरू होता है। इसका मतलब है कि दिन लंबे होने लगते हैं, सर्दी कम होती है और बसंत की शुरुआत होती है। उत्तराखंड के लोग इसे फसल कटाई का समय मानते हैं, जब नई फसल घर आती है और खुशियां मनाई जाती हैं।
इस पर्व की खास विशेषता है घुघुतिया। घरों में आटे से पक्षी के आकार की छोटी-छोटी मिठाइयां (घुघुत) बनाई जाती हैं। इन्हें माला में पिरोकर बच्चे गले में पहनते हैं। अगली सुबह इन्हें कौवों को खिलाया जाता है, क्योंकि मान्यता है कि कौवे पूर्वजों का रूप होते हैं और उन्हें खिलाने से पूर्वज तृप्त होते हैं। गढ़वाल में इसे मकरैंण कहते हैं, जहां लोग सुबह नदी या तालाब में स्नान करते हैं। कुमाऊं में घुघुतिया ज्यादा लोकप्रिय है, जबकि जौनसार इलाके में इसे गिंदी कौथिग के रूप में मेले लगाकर मनाते हैं। बागेश्वर जैसे जगहों पर सरयू-गोमती नदियों के संगम पर उत्तरायणी मेला लगता है, जहां हजारों लोग दान-पुण्य करते हैं।
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धार्मिक महत्व के अलावा, इसका वैज्ञानिक पक्ष भी है। सूर्य उत्तर की ओर झुकता है, जो सकारात्मक ऊर्जा और स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है। इस दिन खिचड़ी खाना और दान करना परंपरा है, क्योंकि चावल-दाल की खिचड़ी सर्दी में सेहत बनाती है। तिल-गुड़ खाने से शरीर में गर्मी आती है। उत्तराखंडी संस्कृति में यह पर्व जीवन से जुड़ा है – प्रकृति, परिवार और समाज की एकता का प्रतीक।
आयोजन में शामिल गीता बलोधी ने बताया, "दिल्ली में रहकर भी हम अपनी परंपराओं को भूलते नहीं। उत्तरायणी हमें याद दिलाती है कि जड़ें मजबूत रखो, तभी जीवन में उड़ान भर सकोगे।" समाज के पदाधिकारियों ने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों से युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति से जुड़ती है।
(यह रिपोर्ट स्थानीय आयोजकों, प्रतिभागियों और उत्तराखंडी परंपराओं पर आधारित है। मकर संक्रांति की शुभकामनाएं!)
उत्तरायणी की खुशियां सबके साथ बांटिए, सुरक्षित रहिए! 🌞🪁
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