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    बंगाल में 15 लाख मतदाताओं की किस्मत अधर में, वोटर लिस्ट की गड़बड़ी पर उठे गंभीर सवाल

     


    बंगाल में 15 लाख मतदाताओं की किस्मत अधर में, वोटर लिस्ट की गड़बड़ी पर उठे गंभीर सवाल

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    कोलकाता से राकेश सिंह, स्थानीय संवाददाता)

    📍नई दिल्ली | रविवार ,29 मार्च 2026

    कोलकाताःपश्चिम बंगाल में मतदाता सूची को लेकर एक बड़ा प्रशासनिक सवाल खड़ा हो गया है। लाखों मतदाताओं के नामों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, जिससे चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल उठने लगे हैं।

    निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, विशेष गहन संशोधन (SIR) के तहत कुल 60 लाख मतदाताओं को जांच के लिए चिह्नित किया गया था। इनमें से 37 लाख मामलों के निपटारे का दावा किया गया, लेकिन जारी की गई दो सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट में केवल 22 लाख नाम ही शामिल किए गए हैं।

    इस अंतर ने करीब 15 लाख मतदाताओं के भविष्य को अधर में लटका दिया है।



    ई-सिग्नेचर की कमी बनी वजह
    अधिकारियों के अनुसार, जिन मामलों में ई-सिग्नेचर नहीं थे, उन्हें लिस्ट में शामिल नहीं किया जा सका। हालांकि, इतने बड़े पैमाने पर ई-सिग्नेचर की कमी क्यों रही, इस पर कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया है।

    एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि “हमें जिन मामलों पर ई-सिग्नेचर मिले, उन्हीं को प्रकाशित किया गया।” लेकिन बाकी 15 लाख मामलों को लेकर स्थिति अस्पष्ट बनी हुई है।


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    तीसरी लिस्ट में भी स्पष्टता नहीं
    शनिवार देर रात तीसरी सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी की गई, लेकिन उसमें शामिल मतदाताओं की संख्या को लेकर भी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। इससे भ्रम और बढ़ गया है।

    अब चुनाव आयोग ने संकेत दिया है कि आगे से हर दिन नई सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी की जाएगी, ताकि छूटे हुए मामलों को धीरे-धीरे शामिल किया जा सके।


    न्यायिक अधिकारियों की बड़ी भूमिका
    इस पूरी प्रक्रिया में 700 से अधिक न्यायिक अधिकारियों को लगाया गया था, जिन्होंने हजारों मामलों की सुनवाई कर फैसले दिए। 23 मार्च तक लगभग 29 लाख मामलों का निपटारा किया जा चुका था, जो बाद में बढ़कर 37 लाख तक पहुंच गया।


    स्थानीय स्तर पर बढ़ी चिंता
    पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल ने कहा कि जिन नामों पर समय पर ई-हस्ताक्षर हो जाएंगे, उन्हें अगली पूरक सूचियों में शामिल किया जाएगा।

    लेकिन जमीनी स्तर पर मतदाताओं में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। कई लोगों को यह डर सता रहा है कि कहीं उनका नाम अंतिम सूची से बाहर न रह जाए।


    चुनावी पारदर्शिता पर सवाल
    विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं का डेटा अधूरा रहना चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकता है। यदि जल्द ही इस पर स्पष्टता नहीं आई, तो यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी तूल पकड़ सकता है।



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