लोकसभा चुनाव में गठबंधन: महाराष्ट्र और तमिलनाडु मेंचुनावी रणनीति तैयार
WAORS हिंदी न्यूज डेस्क »नई दिल्ली
लोकसभा चुनावों को घोषणा से पहले राजनीतिक दलों ने अपनी चुनावी तैयारियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। भाजपा ने महाराष्ट्र और तमिलनाडु में अपने गठबंधनों को भी तय कर दिया है। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस पहले से ही क्षेत्रीय दलों महाराष्ट्र में राकांपा व तमिलनाडु में द्रमुक के साथ है। ऐसे में महाराष्ट्र में जहां भाजपा के सामने अपनी सीटें बरकरार रखने की चुनौती है, वहीं तमिलनाडु में भी एक मजबूत साझेदार के साथ पाने को बहुत कुछ है।
महाराष्ट्र के चुनावी समीकरण
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भाजपा - शिवसेना गठबंधन ( एनडीए)
48 लोकसभा सीट है महाराष्ट्र में लोकसभा की
25 पर इनमें भाजपा और 23 पर शिवसेना लड़ेगी
पिछली बार एनडीए में शामिल स्वाभिमान पक्ष अब गठबंधन में नहीं
एनडीए की सहयोगी रिपब्लिकन पार्टी (आठवले) एक सीट मांग रही है।
अगर उसे सीट दी जाती है तो वह भाजपा के हिस्से से जाएगी
48 लोकसभा सीट है महाराष्ट्र में लोकसभा की
25 पर इनमें भाजपा और 23 पर शिवसेना लड़ेगी
पिछली बार एनडीए में शामिल स्वाभिमान पक्ष अब गठबंधन में नहीं
एनडीए की सहयोगी रिपब्लिकन पार्टी (आठवले) एक सीट मांग रही है।
अगर उसे सीट दी जाती है तो वह भाजपा के हिस्से से जाएगी
2014: एनडीए को भारी सफलता
24 सीटों पर चुनाव लड़ी भाजपा, 23 पर जीत दर्ज
20 सीटों पर शिवसेना लड़ी, 18 पर सफलता मिली
02 सीट पर चुनाव लड़ा स्वाभिमान पक्ष ने, एक पर जीत
2009 के मुकाबले भाजपा को 14 व शिवसेना को सात सीटें ज्यादा मिली
कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन (यूपीए)
कांग्रेस और एनसीपी साथ लड़ेगी। लेकिन सीटों का बंटवारा नहीं हुआ है। माना जा रहा है कि सीटों का बंटवारा भी मोटे तौर पर पिछले चुनाव की तरह ही रहेगा। पिछली बार कांग्रेस ने 26 एनसीपी ने 21 सीटों पर चुनाव लड़ा था। एक सीट महाराष्ट्र विकास अघाड़ी को दी थी।
2014: यूपीए को झटका
26 में से 02 सीट ही जीत सकी थी कांग्रेस, 16 सीट का नुकसान
21 में से 04 सीटें ही जीत सकी एनसीपी, 04 सीटों का नुकसान
01 मात्र सीट महाराष्ट्र विकास अघाड़ी हार गई
26 में से 02 सीट ही जीत सकी थी कांग्रेस, 16 सीट का नुकसान
21 में से 04 सीटें ही जीत सकी एनसीपी, 04 सीटों का नुकसान
01 मात्र सीट महाराष्ट्र विकास अघाड़ी हार गई
समीकरण
महाराष्ट्र में 2014 में मोदी लहर में भाजपा व शिवसेना को पूरे राज्य में भारी सफलता मिली थी। कांग्रेस व एनसीपी समेत विभिन्न दलों के परंपरागत गढ़ टूट गए थे। एनसीपी की चार सीटों में दो सीटें तो शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले ने जीती थी।
2019 में समीकरण बदले हैं। 2014 में भी छह माह बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा व शिवसेना का गठबंधन टूट गया था और राज्य में भाजपा ने पहली बार सरकार बनाई है और शिवसेना बाद में उसकी जूनियर पार्टनर बनी। पूरे पांच साल तक भाजपा व शिवसेना में जमकर शब्दबाण चले। अब फिर से दोनों दलों में चुनाव के समय तालमेल हुआ है। दूसरी तरफ कांग्रेस व एनसीपी नेता बिना किसी राजनीतिक मतभेद के जमीन तैयार करने में जुटे रहे।
महाराष्ट्र में 2014 में मोदी लहर में भाजपा व शिवसेना को पूरे राज्य में भारी सफलता मिली थी। कांग्रेस व एनसीपी समेत विभिन्न दलों के परंपरागत गढ़ टूट गए थे। एनसीपी की चार सीटों में दो सीटें तो शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले ने जीती थी।
2019 में समीकरण बदले हैं। 2014 में भी छह माह बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा व शिवसेना का गठबंधन टूट गया था और राज्य में भाजपा ने पहली बार सरकार बनाई है और शिवसेना बाद में उसकी जूनियर पार्टनर बनी। पूरे पांच साल तक भाजपा व शिवसेना में जमकर शब्दबाण चले। अब फिर से दोनों दलों में चुनाव के समय तालमेल हुआ है। दूसरी तरफ कांग्रेस व एनसीपी नेता बिना किसी राजनीतिक मतभेद के जमीन तैयार करने में जुटे रहे।
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मुद्दे
किसानों की आत्महत्या, कर्जमाफी, फसल बीमा, मराठा आरक्षण ऐसे मुद्दे हैं जो राज्य सरकार के लिए मुसीबत बने रहे हैं। इन मुद्दों का असर लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा।
छोटे दल
दो बड़े गठबंधनों में छोटे दलों की भूमिका सीमित हो गई है। रिपब्लिकन पार्टी के धड़े व स्वाभिमानी पक्ष का असर एक दो सीटों तक सीमित है। उनकी सफलता किसी एक गठबंधन के साथ जुड़ने पर ही निर्भर करेगी।
तमिलनाडु के चुनावी समीकरण
तमिलनाडु में भी दो बड़े गठबंधनों के बीच लड़ाई तय हो गई है। ऐसे में मुकाबला कांटे का होगा। राज्य के दोनों प्रमुख दलों द्रमुक व अन्नाद्रमुक ने बीते पांच साल में अपने शीर्ष नेताओं करुणानिधि व जयललिता को खोया है। दोनों दलों के नए नेतृत्व की इन चुनावों में परीक्षा होनी है।
दो बड़े गठबंधनों में छोटे दलों की भूमिका सीमित हो गई है। रिपब्लिकन पार्टी के धड़े व स्वाभिमानी पक्ष का असर एक दो सीटों तक सीमित है। उनकी सफलता किसी एक गठबंधन के साथ जुड़ने पर ही निर्भर करेगी।
तमिलनाडु के चुनावी समीकरण
तमिलनाडु में भी दो बड़े गठबंधनों के बीच लड़ाई तय हो गई है। ऐसे में मुकाबला कांटे का होगा। राज्य के दोनों प्रमुख दलों द्रमुक व अन्नाद्रमुक ने बीते पांच साल में अपने शीर्ष नेताओं करुणानिधि व जयललिता को खोया है। दोनों दलों के नए नेतृत्व की इन चुनावों में परीक्षा होनी है।
पिछली बार भाजपा को कोई बड़ा सहयोगी नहीं मिला था तब उसने पीएमके, डीएमडीके समेत छह छोटे दलों के साथ मिलकर मोर्चा बनाना था, जिसमें दो सीटें (एक भाजपा व एक पीएमके) को मिली थी। अन्नाद्रमुक ने अलग सभी सीटों पर लड़कर 39 में से 37 सीटें जीतकर सूपड़ा साफ कर दिया था। कांग्रेस भी अलग लड़ी थी और उसे भी कोई सीट नहीं मिली थी। इसी तरह से द्रमुक के गठबंधन को भी शून्य ही मिला था।
एनडीए की स्थिति
भाजपा व अन्नाद्रमुक ने पीएमके के साथ गठबंधन को मजबूत किया है। राज्य की 39 सीटों में से भाजपा पांच पर और पीएमके सात पर चुनाव लड़ेगी। बाकी सीटें अन्नाद्रमुक के पास रहेंगी। विजयकांत के नेतृत्व वाली डीएमडीके के साथ अभी समझौता होना बाकी है। उसे सीटें अन्नाद्रमुक अपने पास से देगी। डीएमडीके को दो से तीन सीटें मिल सकती है। एनआर कांग्रेस को भी एक सीट मिलने की संभावना है।
भाजपा व अन्नाद्रमुक ने पीएमके के साथ गठबंधन को मजबूत किया है। राज्य की 39 सीटों में से भाजपा पांच पर और पीएमके सात पर चुनाव लड़ेगी। बाकी सीटें अन्नाद्रमुक के पास रहेंगी। विजयकांत के नेतृत्व वाली डीएमडीके के साथ अभी समझौता होना बाकी है। उसे सीटें अन्नाद्रमुक अपने पास से देगी। डीएमडीके को दो से तीन सीटें मिल सकती है। एनआर कांग्रेस को भी एक सीट मिलने की संभावना है।
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यूपीए की स्थिति
यूपीए में कांग्रेस और द्रमुक इस बार साथ लड़ेंगे। इनके बीच जल्द ही सीटों का समझौता भी होने की संभावना है। इसमें बड़ा हिस्सा द्रमुक के पास रहेगा। वामपंथी दलों को लेकर स्थिति साफ नहीं है। 2009 में द्रमुक को 18 सीटें मिली थीं, लेकिन 2014 में वह शून्य पर आ गई थी। कांग्रेस भी आठ सीटों से शून्य पर आ गई थी। माकपा व भाकपा को भी अपनी एक एक सीट खोनी पड़ी थी।
यूपीए में कांग्रेस और द्रमुक इस बार साथ लड़ेंगे। इनके बीच जल्द ही सीटों का समझौता भी होने की संभावना है। इसमें बड़ा हिस्सा द्रमुक के पास रहेगा। वामपंथी दलों को लेकर स्थिति साफ नहीं है। 2009 में द्रमुक को 18 सीटें मिली थीं, लेकिन 2014 में वह शून्य पर आ गई थी। कांग्रेस भी आठ सीटों से शून्य पर आ गई थी। माकपा व भाकपा को भी अपनी एक एक सीट खोनी पड़ी थी।
संभावनाएं
करुणानिधि के बाद द्रमुक में एमके स्टालिन उसके नए नेता के रूप में उभरे हैं। कांग्रेस वा वायको के साथ आने से यह गठबंधन मजबूत हुआ है। दूसरी तरफ अन्नाद्रमुक में जयललिता के बाद कोई एक नेता नहीं उभर सका है। मुख्यमंत्री पलानीस्वामी व उप मुख्यमंत्री पनीरसेल्वम मिलजुल कर पार्टी व सरकार चला रहे हैं। ऐसे में भाजपा व पीएमके के साथ मिलकर अन्नाद्रमुक जीत की संभावनाएं तलाश रही है। राज्य में क्षेत्रीय व जातीय समीकरणों से ज्यादा चमत्कारिक नेतृत्व नतीजे तय करता रहा है। ऐसे में इस बार जयललिता व करुणानिधि के बिना होने वाले चुनाव नए राजनीति तय करेंगे।
करुणानिधि के बाद द्रमुक में एमके स्टालिन उसके नए नेता के रूप में उभरे हैं। कांग्रेस वा वायको के साथ आने से यह गठबंधन मजबूत हुआ है। दूसरी तरफ अन्नाद्रमुक में जयललिता के बाद कोई एक नेता नहीं उभर सका है। मुख्यमंत्री पलानीस्वामी व उप मुख्यमंत्री पनीरसेल्वम मिलजुल कर पार्टी व सरकार चला रहे हैं। ऐसे में भाजपा व पीएमके के साथ मिलकर अन्नाद्रमुक जीत की संभावनाएं तलाश रही है। राज्य में क्षेत्रीय व जातीय समीकरणों से ज्यादा चमत्कारिक नेतृत्व नतीजे तय करता रहा है। ऐसे में इस बार जयललिता व करुणानिधि के बिना होने वाले चुनाव नए राजनीति तय करेंगे।
Posted By:विवेक कुमार
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