रांची में क्रिसमस की उदासी: डीआईजी ग्राउंड के ईसाई परिवारों की बेघरी की कहानी
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वी न्यूज 24, रांची ब्यूरो
✍️द्वारा: संजय ठाकुर
प्रकाशित: 25 दिसंबर 2025
रांची: एक तरफ पूरा शहर क्रिसमस की चमक-दमक में डूबा हुआ है, घंटियां बज रही हैं, कैरोल गूंज रहे हैं और लोग परिवार के साथ यीशु मसीह के जन्म का जश्न मना रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ, डीआईजी ग्राउंड में बसे दर्जनों ईसाई परिवारों के लिए यह त्योहार सिर्फ दर्द और लाचारी की याद बनकर रह गया है। यहां के लोग, जो सालों से अपनी जड़ें जमाए हुए थे, अब टूटे-फूटे घरों के मलबे के बीच बैठकर अपनी किस्मत को कोस रहे हैं। रांची की ठंडी हवाओं में क्रिसमस की खुशियां घुल रही हैं, लेकिन इन परिवारों के लिए न छत बची है, न ही जश्न मनाने का कोई ठिकाना।
जब हमारी टीम ने इन पीड़ित परिवारों से मुलाकात की, तो दृश्य किसी प्राकृतिक आपदा के बाद की तबाही जैसा लग रहा था। ईंटें, सरिया और पत्थरों के ढेर के बीच लोग अपने हाथों से सामान चुन रहे थे। वे हाथ, जो कभी मजबूत घर खड़े करते थे, अब सिर्फ अवशेष इकट्ठा कर रहे हैं। खिड़कियां टूट चुकी हैं, दरवाजे उखड़ चुके हैं और दीवारें गिरकर खंडहर में तब्दील हो गई हैं। अनामिका गुड़िया, एक पीड़ित महिला, आंसू भरी आंखों से बताती हैं, "चारों ओर क्रिसमस की रौनक है। लोग अपने बच्चों के साथ गिफ्ट्स का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन हमारा तो सब कुछ छिन गया। प्रशासन ने हमें घर से बेदखल कर दिया। अब न क्रिसमस का केक बनेगा, न मिठाई आएगी।"
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इस इलाके में पहले आठ से ज्यादा घर थे, जहां ग्लोरिया कंडुलना, फ्लुजेंसिया बाड़ा, रेमन डुंगडुंग सोनु और मारिया जैसे परिवार दशकों से रह रहे थे। हर साल क्रिसमस पर घरों में मेहमानों की भीड़ लगती थी, बच्चे उपहारों से खुश होते थे और हंसी-ठिठोली का माहौल रहता था। लेकिन इस बार सब कुछ बदल गया। हाईकोर्ट के आदेश पर रिम्स की जमीन पर बसे इन परिवारों को अवैध कब्जाधारी करार देकर उनके घर तोड़ दिए गए। अब ये लोग किराए के छोटे-छोटे कमरों में सिमटकर रहने को मजबूर हैं। जहां पहले दर्जनों कमरे गुलजार रहते थे, अब दो-चार कमरों में पूरा परिवार घुट रहा है।
रांची जैसे शहर में, जहां विकास के नाम पर हर दिन नई इमारतें खड़ी हो रही हैं, ऐसे में इन गरीब ईसाई परिवारों की हालत देखकर सवाल उठता है कि क्या न्याय की परिभाषा सिर्फ अमीरों के लिए है? हाईकोर्ट का फैसला कानूनी हो सकता है, लेकिन क्या प्रशासन ने इन परिवारों के पुनर्वास के लिए कोई योजना बनाई? झारखंड की सरकार, जो खुद को आदिवासी और अल्पसंख्यक हितैषी बताती है, क्या इनकी सुध लेगी? ये परिवार, जो ज्यादातर आदिवासी ईसाई हैं, सालों से यहां बसते आए हैं। उनकी जड़ें उखाड़कर क्या हम क्रिसमस की असली भावना को नहीं भूल रहे – जो दया, प्रेम और मदद की है?
पीड़ितों की आवाजें सुनकर लगता है कि रांची की चमकती लाइट्स के पीछे एक अंधेरा छिपा है। ग्लोरिया कंडुलना कहती हैं, "हमारे बच्चे क्रिसमस ट्री सजाने की बजाय मलबे में खेल रहे हैं। क्या यही विकास है?" प्रशासन का कहना है कि यह जमीन रिम्स की है और अवैध कब्जा हटाना जरूरी था, लेकिन क्या इन परिवारों को वैकल्पिक व्यवस्था दी गई? सर्दी के इस मौसम में बेघर होना कितना कष्टदायक है, यह सोचकर ही रूह कांप जाती है।
वी न्यूज 24 की टीम मानती है कि क्रिसमस सिर्फ जश्न नहीं, बल्कि एकजुटता का पर्व है। सरकार और समाज को इन परिवारों की मदद के लिए आगे आना चाहिए। क्या आने वाले दिनों में इनकी क्रिसमस फिर से खुशहाल होगी? यह सवाल हर रांचीवासी के मन में गूंजना चाहिए।
संजय ठाकुर रांची में वी न्यूज 24 के वरिष्ठ संवाददाता हैं और सामाजिक मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग करते हैं।
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