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    2026 में भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी’ की अग्निपरीक्षा अस्थिर पड़ोस, उभरते खतरे और भारत के सामने संतुलन की चुनौती

     

    2026 में भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी’ की अग्निपरीक्षा अस्थिर पड़ोस, उभरते खतरे और भारत के सामने संतुलन की चुनौती

    We News 24 : डिजिटल डेस्क »✍️विशेष सम्पादकीय | अनुराग मिश्रा, वी न्यूज 24

    नई दिल्ली / ढाका / इस्लामाबाद / काठमांडू


    साल 2026 भारत की विदेश नीति के लिए केवल एक कैलेंडर वर्ष नहीं, बल्कि रणनीतिक परीक्षा का दौर साबित होने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बहुचर्चित ‘नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी’ ऐसे समय में निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जब भारत के तीन अहम पड़ोसी—बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल—गहरे राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक उथल-पुथल से गुजर रहे हैं।

    यह संकट केवल उनकी आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर भारत की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, आतंकवाद, शरणार्थी प्रवाह और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ता दिख रहा है।


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    🇧🇩 बांग्लादेश: चुनावी अस्थिरता और इस्लामी राजनीति का उभार

    ( लोकतंत्र सवालों के घेरे में )

    ढाका की सियासत इस वक्त भारी अनिश्चितता से गुजर रही है। चुनावों को लेकर अविश्वास, विपक्ष का बहिष्कार और सड़कों पर उतरती राजनीति ने लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर किया है। इससे भी बड़ी चिंता कट्टर इस्लामी समूहों की बढ़ती स्वीकार्यता है, जो भारत-विरोधी नैरेटिव को हवा दे रहे हैं।

    भारत के लिए खतरा दोहरा है—

    • सीमा पार कट्टरपंथ

    • पूर्वोत्तर राज्यों में अस्थिरता की आशंका

    अगर ढाका में सत्ता संतुलन कमजोर होता है, तो “भारत-विरोध सबसे आसान राजनीति” बन सकता है—जिसका इतिहास भारत पहले भी देख चुका है।


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     पाकिस्तान: सेना का वर्चस्व और टूटी हुई अर्थव्यवस्था

    ( असली ताकत फौज है )

    पाकिस्तान में लोकतंत्र एक बार फिर सेना की परछाईं में सिमटता नजर आ रहा है। आर्थिक बदहाली, IMF पर निर्भरता और आतंरिक असंतोष ने वहां की सिविल सरकार को लगभग निष्प्रभावी बना दिया है।

    ऐसे हालात में इतिहास गवाह है कि

    जब पाकिस्तान में संकट गहराता है, भारत के खिलाफ उकसावे की राजनीति तेज होती है।

    LoC पर तनाव, आतंकवादी संगठनों की पुनर्सक्रियता और “कश्मीर कार्ड” फिर से टेबल पर आने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।


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    नेपाल: युवा असंतोष और भारत-विरोधी भावनाएं

    ( भारत से दूरी, चीन से नजदीकी )

    काठमांडू की गलियों में इस वक्त युवा असंतोष साफ दिखाई देता है। बेरोजगारी, राजनीतिक अस्थिरता और बार-बार बदलती सरकारों ने नई पीढ़ी को निराश किया है। इस असंतोष को भारत-विरोधी नैरेटिव में बदलने की कोशिशें भी तेज हुई हैं।

    यहां चिंता की बात यह है कि

    • चीन का बढ़ता प्रभाव
    • भारत को ‘पुराना दबावकारी पड़ोसी’ बताने की राजनीति

    भारत-नेपाल के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रोटी-बेटी के रिश्ते इस नैरेटिव की भेंट चढ़ते दिख रहे हैं।


    भारत के सामने असली सवाल: रणनीति क्या हो?

    2026 में भारत के लिए सिर्फ कूटनीति काफी नहीं होगी। उसे अपनानी होगी तीन-स्तरीय रणनीति:

    1. संवाद, लेकिन सख्ती के साथ
      पड़ोसियों से बातचीत जारी रहे, पर राष्ट्रीय सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं।

    2. जन-कूटनीति (People-to-People Diplomacy)
      युवाओं, छात्रों, मीडिया और सिविल सोसायटी से सीधा संवाद।

    3. क्षेत्रीय सहयोग को पुनर्जीवित करना
      BIMSTEC, BBIN जैसे मंचों को कागज़ से ज़मीन पर उतारना।


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     पड़ोसी बदलेंगे, भारत को संतुलन साधना होगा

    भारत अपने पड़ोस को नहीं बदल सकता, लेकिन अपने दृष्टिकोण, प्रतिक्रिया और रणनीति को ज़रूर अपडेट कर सकता है।
    2026 यह तय करेगा कि ‘नेबरहुड फर्स्ट’ केवल नारा है या दीर्घकालिक नीति।

    अगर भारत समय रहते संतुलन साधने में सफल रहा, तो यह न सिर्फ क्षेत्रीय शक्ति बनेगा, बल्कि स्थिरता का केंद्र भी।



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