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    क्या इंदौर दूषित जल हादसे के असली जिम्मेदार मुख्यमंत्री और उनके खास अधिकारी है?

    क्या इंदौर दूषित जल हादसे के असली जिम्मेदार मुख्यमंत्री और उनके खास अधिकारी है?


    • क्या इंदौर दूषित जल हादसे के असली जिम्मेदार मुख्यमंत्री और उनके खास प्रशासनिक अधिकारी है? इंदौर की पीड़ा और जवाबदेही का सवाल: कैलाश विजयवर्गीय के अनुभव की अनुपस्थिति ने क्या बढ़ाया संकट? इंदौर जल त्रासदी ने उठाया नेतृत्व का सवाल, अनुभव की कमी पड़ी भारी क्या जवाबदेही और अनुभवी नेतृत्व से टल सकती थी त्रासदी? स्वच्छ शहर में दूषित व्यवस्था ने खोली प्रशासनिक कमजोरियाँ


    We News 24 : डिजिटल डेस्क »✍️विजया पाठक जगत विजन,इंदौर

    इंदौर:- नई सरकार बनने के बाद दो साल हो गये हैं। पर इन दो सालों में प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर को खोखला करने की हर मुमकिन कोशिश की गई। जिसका सिर्फ एक उद्देश्य था कि कैसे बीजेपी के मालवा के सबसे कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय को कैसे कमजोर किया जाए। हर प्रशासनिक अधिकारी की जमावट मुख्यमंत्री द्वारा स्वयं की गई, इससे आगे जाकर वो खुद ही इंदौर के प्रभारी मंत्री बन गए। पिछले 02 साल में इंदौर को कमजोर किया गया, जिसके फलस्वरूप इंदौर में क्राइम, ड्रग्स और भ्रष्टाचार बढ़ता ही गया। इंदौर को उज्जैन से चलाने का नतीजा है भागीरथपुरा दूषित पानी कांड। इसकी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री और उनके अपने इंदौर के अधिकारियों की है। इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल के कारण कई परिवारों का उजड़ जाना केवल एक स्थानीय दुर्घटना नहीं, बल्कि शासन–प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिंह है। देश के स्वच्छतम शहर के तमगे के बीच यदि नागरिक गंदा पानी पीने को मजबूर हों और उसकी कीमत जान देकर चुकानी पड़े तो यह घटना नहीं व्यवस्था की विफलता कही जाएगी। इस त्रासदी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इसकी जिम्मेदारी किसकी है और ऐसे हादसों को रोकने के लिए नेतृत्व स्तर पर कौनसा दृष्टिकोण जरूरी था? यह निर्विवाद है कि पेयजल आपूर्ति जैसी मूलभूत सेवा में चूक का सीधा असर आमजन के जीवन पर पड़ता है। भागीरथपुरा में जो हुआ, उसने नगर निगम, जिला प्रशासन और राज्य सरकार तीनों की जवाबदेही को कठघरे में खड़ा कर दिया। आरोप यह है कि चेतावनियों के बावजूद समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, निगरानी ढीली रही और समन्वय की कमी ने संकट को गहराया। ऐसी परिस्थितियों में राजनीतिक नेतृत्व की संवेदनशीलता और प्रशासनिक अनुभव निर्णायक भूमिका निभाते हैं।


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    त्वरित निर्णय और प्रशासन पर मजबूत पकड़ की कमी
    यहीं पर कैलाश विजयवर्गीय का संदर्भ स्वतः उभरता है। इंदौर जैसे बड़े, घनी आबादी वाले और जटिल शहरी ढांचे वाले शहर को संभालने के लिए केवल आदेशात्मक शैली नहीं, बल्कि जमीनी समझ, त्वरित निर्णय और प्रशासन पर मजबूत पकड़ की जरूरत होती है। कैलाश विजयवर्गीय का लंबा राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव, शहरी निकायों की कार्यप्रणाली पर उनकी पकड़ और संकट के समय हस्तक्षेप की उनकी शैली इंदौर ने पहले भी देखी है। उनके रहते नगर निगम और जिला प्रशासन के बीच समन्वय अधिक सशक्त रहा, यह धारणा शहर में व्यापक है। आलोचना का एक बड़ा बिंदु यह भी है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इंदौर जैसे संवेदनशील जिले का प्रभार ऐसे समय में अनुभवी हाथों में क्यों नहीं सौंपा। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि बड़े शहरों में छोटी प्रशासनिक चूक भी बड़े हादसे का रूप ले लेती है। यदि इंदौर जिले की जिम्मेदारी कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेता को दी जाती तो संभव है कि समय रहते चेतावनियों पर कार्रवाई होती, तकनीकी खामियों की जांच तेज होती और नागरिकों तक दूषित पानी पहुंचने से पहले ही आपूर्ति रोकी जाती।


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    राजनीतिक नेतृत्व के सख्ती की आवश्यकता इस घटना ने नगर निगम अधिकारियों की कार्यप्रणाली की भी पोल खोल दी है। पाइपलाइन की निगरानी, जल शोधन संयंत्रों की नियमित जांच और शिकायतों पर त्वरित प्रतिक्रिया ये सब कागजों में तो मौजूद हैं, लेकिन जमीन पर इनकी प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। आरोप है कि फाइलों में सब कुछ दुरुस्त दिखाया गया, जबकि वास्तविकता इससे उलट थी। यदि राजनीतिक नेतृत्व सख्त होता, नियमित समीक्षा करता और जवाबदेही तय करता, तो शायद हालात इतने भयावह न होते। इंदौर की यह त्रासदी केवल एक शहर तक सीमित नहीं है। भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर जैसे अन्य बड़े शहरों के नागरिकों के मन में भी यह डर बैठ गया है कि कहीं अगला नंबर उनका तो नहीं। शहरी जल आपूर्ति व्यवस्था में यदि यही ढीलापन और लापरवाही बनी रही, तो यह संकट किसी भी शहर में दोहराया जा सकता है। ऐसे में सवाल यह नहीं कि हादसा हुआ क्यों, बल्कि यह है कि भविष्य में इसे रोका कैसे जाए।

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    शहरी प्रशासन को कैलाश विजयवर्गीय ने केवल योजनाओं के भरोसे नहीं छोड़ा


    कैलाश विजयवर्गीय ने अपने राजनीतिक जीवन में शहरी प्रशासन को केवल योजनाओं के भरोसे नहीं छोड़ा, बल्कि नियमित फील्ड विजिट, अधिकारियों की जवाबदेही और जनता से सीधा संवाद इन तीनों को समान महत्व दिया। इंदौर में उनके प्रभाव के दौरान शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई और अफसरों पर स्पष्ट संदेश “लापरवाही बर्दाश्त नहीं” एक स्थापित कार्य संस्कृति थी। यही कारण है कि आज भी शहर का एक बड़ा वर्ग मानता है कि यदि वही मॉडल जारी रहता तो भागीरथपुरा जैसी घटना टाली जा सकती थी। आरोप यह भी है कि वर्तमान व्यवस्था में “सिस्टम लीकेज” हुआ यानी कलेक्टर से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक सूचनाओं का सही और समय पर प्रवाह नहीं हुआ या हुआ तो उस पर कार्रवाई नहीं की गई। यदि यह सही है।


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    संवेदनशीलता और तत्परता की मिसाल बने कैलाश विजयवर्गीय


    भागीरथपुरा की दर्दनाक घटना के बाद जब शहर शोक और आक्रोश में डूबा था, तब सबसे पहले मौके पर पहुँचकर पीड़ितों और मृतकों के परिजनों से मिलने वाले नेताओं में कैलाश विजयवर्गीय अग्रणी रहे। उन्होंने बिना किसी औपचारिकता के सीधे प्रभावित परिवारों के घर जाकर उनसे मुलाकात की, उनकी पीड़ा सुनी और उन्हें ढांढस बंधाया। यह उपस्थिति केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का प्रतीक मानी गई। उन्होंने पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने, दोषियों पर सख्त कार्रवाई कराने और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस कदम उठाने का भरोसा दिलाया। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि संकट की इस घड़ी में विजयवर्गीय का मौके पर पहुँचना प्रशासन के लिए भी एक स्पष्ट संदेश था कि जनता की पीड़ा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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