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    राम रहीम को फिर 40 दिन की पैरोल, अब तक 15वीं बार जेल से बाहर – सवाल उठे: क्या नियम सबके लिए बराबर?

    राम रहीम को फिर 40 दिन की पैरोल, अब तक 15वीं बार जेल से बाहर – सवाल उठे: क्या नियम सबके लिए बराबर?


    We News 24 : डिजिटल डेस्क »✍️

    विकास मेहता, संवाददाता वी न्यूज 24, चंडीगढ़

    चंडीगढ़। डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को एक बार फिर 40 दिन की पैरोल मंजूर हो गई है। रोहतक जेल में सजा काट रहे राम रहीम के लिए यह कोई नई बात नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, वह आज या कल जेल से बाहर आ सकते हैं और सिरसा स्थित डेरा मुख्यालय में रहेंगे। इससे पहले अगस्त में रक्षाबंधन से ठीक पहले उन्हें इतने ही दिनों की पैरोल मिली थी, जब उन्होंने परिवार से मिलने का हवाला दिया था।

    वी न्यूज 24 के संवाददाता विकास मेहता की रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में पंचकूला की सीबीआई अदालत ने दो साध्वियों से बलात्कार के मामले में राम रहीम को दोषी ठहराते हुए 20 साल की सजा सुनाई थी। इसके अलावा, पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या और एक अन्य मामले में भी सजा हुई है। अदालत ने उन पर 30 लाख 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था। लेकिन सजा के बावजूद राम रहीम अब तक 15 बार पैरोल या फरलो पर जेल से बाहर आ चुके हैं। यह आंकड़ा 2017 से अब तक का है, जिसमें पिछले दो सालों में ही 7-8 बार पैरोल शामिल हैं।

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    अब सवाल उठ रहा है कि क्या राम रहीम को बार-बार पैरोल मिलना सही है? हरियाणा जेल नियमों के तहत, अच्छे व्यवहार वाले कैदियों को पैरोल या फरलो मिल सकती है। लाइफ इम्प्रिजनमेंट या लंबी सजा वाले कैदियों के लिए भी यह प्रावधान है, लेकिन रेप और मर्डर जैसे गंभीर अपराधों में सख्ती बरतनी चाहिए। पैरोल की मंजूरी रोहतक डिविजनल कमिश्नर देते हैं, और इसका आधार परिवार से मिलना, स्वास्थ्य या अन्य मानवीय कारण होते हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि राम रहीम को 'विशेष दर्जा' मिल रहा है, क्योंकि उनके पास राजनीतिक कनेक्शन और डेरा का बड़ा फॉलोअर्स बेस है।

    फिर, अगर ऐसा नियम है तो दूसरे कैदियों को यह सुविधा क्यों नहीं मिलती? विशेषज्ञों के मुताबिक, पैरोल हर कैदी का हक है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह जेल प्रशासन की मर्जी पर निर्भर करता है। कई सामान्य कैदियों की पैरोल अर्जियां सालों लंबित रहती हैं, जबकि राम रहीम की हर बार जल्दी मंजूर हो जाती है। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भी फरवरी 2024 में आदेश दिया था कि राम रहीम को पैरोल बिना कोर्ट की इजाजत के न दी जाए, लेकिन उसके बाद भी कई बार पैरोल मिली। एसजीपीसी जैसी संस्थाओं ने इसका विरोध किया है, कहते हुए कि यह बेटी बचाओ अभियान का मजाक उड़ा रहा है।

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    राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि चुनावी मौसम में डेरा का प्रभाव हरियाणा और पंजाब में वोट बैंक के रूप में काम करता है, जिसकी वजह से सरकारें नरम रुख अपनाती हैं। हालांकि, डेरा प्रवक्ता का कहना है कि पैरोल 'कानून के दायरे में' दी गई है और राम रहीम डेरा में रहकर सामाजिक कार्य करेंगे। लेकिन जनता में गुस्सा है – क्या न्याय व्यवस्था सबके लिए बराबर है?

    यह मामला फिर से बहस का केंद्र बन गया है। क्या पैरोल सिस्टम में सुधार की जरूरत है? या फिर गंभीर अपराधियों के लिए अलग नियम बनने चाहिए? फिलहाल, राम रहीम की पैरोल पर नजर रखी जा रही है, और विपक्षी पार्टियां इसे मुद्दा बना सकती हैं।

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