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    क्या आप जानते हैं? देश का पहला गणतंत्र दिवस कहां मनाया गया था और कर्तव्य पथ पर परेड कब शुरू हुई?


    क्या आप जानते हैं? देश का पहला गणतंत्र दिवस कहां मनाया गया था और कर्तव्य पथ पर परेड कब शुरू हुई?


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    रिपोर्ट — पत्रकार: रवि शर्मा ,दिल्ली | 24 जनवरी 2026


    हर साल 26 जनवरी को पूरा देश गणतंत्र दिवस बड़े गर्व और धूमधाम से मनाता है। दिल्ली के कर्तव्य पथ पर होने वाली भव्य परेड आज देश की शान बन चुकी है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि देश का पहला गणतंत्र दिवस समारोह न तो कर्तव्य पथ पर हुआ था और न ही मौजूदा राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक के रास्ते पर। गणतंत्र दिवस आज हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय शान बन चुका है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस भव्य परंपरा की शुरुआत कितनी साधारण और अलग तरीके से हुई थी? आज हम आपको बताते हैं वो अनसुनी कहानी, जो ज्यादातर लोग नहीं जानते।

    1950 में जब भारत का संविधान पूरी तरह लागू हुआ, तो पहला गणतंत्र दिवस दिल्ली के इरविन एम्फीथिएटर (जिसे अब मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम कहा जाता है) में मनाया गया। राजपथ पर वो शानदार परेड, जिसे आज हम देखते हैं, उसकी शुरुआत तो 1955 में हुई थी!



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    पहले गणतंत्र दिवस की खास बातें

    • राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद घोड़े की गाड़ी में सवार होकर कार्यक्रम में पहुंचे थे, कोई आधुनिक कार नहीं।
    • मुख्य अतिथि थे इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो, जिन्होंने भारत की नई लोकतांत्रिक यात्रा को शुभकामनाएं दीं।
    • परेड में सेना के जवान, घुड़सवार दस्ते और सांस्कृतिक प्रदर्शन शामिल थे।
    • करीब 15,000 लोग इस ऐतिहासिक मौके के गवाह बने।


    1951 और 1952 में परेड रामलीला मैदान में हुई, लेकिन जगह कम पड़ने और मौसम की वजह से दिक्कतें आईं। आखिरकार 1955 में राजपथ (अब कर्तव्य पथ) को चुना गया, जहां से राष्ट्रपति भवन से लाल किले तक परेड निकलती है। इस रूट का चयन इसलिए किया गया क्योंकि यह सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक है।


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    1955 की परेड में पहली बार राज्यों की झांकियां भी शामिल की गईं, जो भारत की विविधता को दिखाती थीं। मुख्य अतिथि फ्रांस के राष्ट्रपति रेने कोटी थे। तब से यह परंपरा लगातार जारी है, जिसमें अब मिसाइलें, ड्रोन और आधुनिक हथियार भी दिखाए जाते हैं।


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    यह कहानी बताती है कि आज की भव्यता की जड़ें कितनी सादगी और संघर्ष से जुड़ी हैं। गणतंत्र दिवस सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि हमारे संविधान की सर्वोच्चता और देश की एकता का जीता-जागता प्रतीक है।

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