सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पैदल चलना मौलिक अधिकार, फुटपाथ देना सरकारों की कानूनी जिम्मेदारी
सब-हेडलाइन:
अनुच्छेद 19 और 21 के तहत सुरक्षित फुटपाथ का अधिकार संरक्षित, सड़कों पर वाहनों से पहले पैदल यात्रियों को प्राथमिकता देने की टिप्पणी
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रिपोर्टर: दीपक कुमार | We News 24 Digital Desk
नई दिल्ली। देश के करोड़ों पैदल यात्रियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी महत्व का फैसला सुनाया है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षित रूप से पैदल चलना भारतीय नागरिकों का मौलिक अधिकार है और सरकारों व स्थानीय निकायों की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वे सड़कों के किनारे सुरक्षित एवं सीमांकित फुटपाथ उपलब्ध कराएं।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत देश में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार तथा अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, पैदल चलने के अधिकार को पूर्ण संरक्षण प्रदान करते हैं।
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फुटपाथ देना सरकार का कर्तव्य
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जहां सड़क होगी, वहां पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित फुटपाथ का निर्माण और उसका रखरखाव सुनिश्चित करना प्रशासन का बाध्यकारी दायित्व है। अदालत ने इसे केवल एक नीति संबंधी विषय नहीं बल्कि लागू करने योग्य कानूनी जिम्मेदारी बताया।
पीठ ने कहा कि शहरों और कस्बों में पैदल यात्रियों की सुरक्षा को नजरअंदाज कर केवल मोटर वाहनों को प्राथमिकता देना लंबे समय से चली आ रही गंभीर समस्या है। इसके कारण आम नागरिकों का जीवन लगातार जोखिम में पड़ रहा है।
5 वर्षीय बच्चे की मौत से जुड़ा मामला
यह महत्वपूर्ण फैसला एक दर्दनाक सड़क दुर्घटना के मामले में आया, जिसमें एक पांच वर्षीय बच्चे की मौत हो गई थी। बच्चे के पिता उसे स्कूल छोड़ने जा रहे थे, तभी पीछे से आए एक टैंकर ने उसे कुचल दिया। दुर्घटना स्थल पर न तो फुटपाथ था और न ही पैदल यात्रियों के लिए कोई सुरक्षित क्रॉसिंग।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए बच्चे के पिता को मिलने वाले मुआवजे की राशि बढ़ाकर 11,44,628 रुपये कर दी और दो माह के भीतर भुगतान का निर्देश दिया। साथ ही उच्च न्यायालय के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें मुआवजे की राशि कम कर दी गई थी।
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अब अधिकारियों पर भी ठोका जा सकेगा दावा
सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी क्षेत्र में फुटपाथ नहीं होने या पैदल यात्री सुविधाओं की कमी के कारण किसी नागरिक के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वह संबंधित सरकारी अधिकारियों और एजेंसियों के खिलाफ संवैधानिक एवं कानूनी कार्रवाई कर सकता है।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में मुआवजे की मांग मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मिलने वाले दावों से अलग और स्वतंत्र होगी। यानी पीड़ित नागरिक संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से भी जवाबदेही तय कर सकते हैं।
"वाहनों से पहले पैदल चलने का अधिकार"
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पहिए के आविष्कार से बहुत पहले इंसान पैदल चलता आया है। इसलिए संविधान के तहत आवागमन का प्राथमिक अधिकार पैदल चलने का अधिकार है, जो किसी भी मोटर वाहन के उपयोग से पहले आता है।
अदालत ने कहा कि सुरक्षित, सुगम और सीमांकित फुटपाथों तक पहुंच इस मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। यदि शहरों की योजना केवल वाहनों को ध्यान में रखकर बनाई जाएगी, तो यह संविधान की भावना के विपरीत होगा।
शहरी निकायों के लिए बड़ा संदेश
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला देश के सभी नगर निगमों, नगर परिषदों, विकास प्राधिकरणों और राज्य सरकारों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि अब फुटपाथों की अनदेखी करना आसान नहीं होगा। भविष्य में पैदल यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में प्रशासनिक जवाबदेही और कानूनी दायित्व दोनों बढ़ सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, बल्कि यह देश के करोड़ों पैदल यात्रियों के संवैधानिक अधिकारों को मजबूत करने वाला ऐतिहासिक निर्णय भी है।
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