दार्जिलिंग गोरखा मुद्दे पर केंद्र का बड़ा कदम, स्थाई समाधान के लिए समिति गठित

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नई दिल्ली | स्थानीय रिपोर्टर: सुजीत कुमार विस्वास
केंद्र सरकार ने दार्जिलिंग की पहाड़ियों में लंबे समय से चले आ रहे गोरखा पहचान और प्रशासनिक मांगों के मुद्दे पर ‘स्थाई राजनीतिक समाधान’ की दिशा में पहला ठोस कदम उठाया है। 22 अगस्त को दार्जिलिंग की तलहटी सुकना में हुई अहम त्रिपक्षीय बैठक के बाद केंद्र ने एक समिति गठित करने का ऐलान किया है, जो समझौते का मसौदा तैयार करेगी और अंतिम समाधान के तौर-तरीके तय करेगी।
यह बैठक केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई। इसमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, गोरखा नेता और पहाड़ी प्रशासन के प्रतिनिधि शामिल हुए। बैठक शाह के पश्चिम बंगाल दौरे के तीसरे और अंतिम दिन हुई।
गृह मंत्रालय के आधिकारिक बयान के अनुसार, बैठक में पहाड़ी आबादी की अलग पहचान, स्थाई राजनीतिक समाधान और संविधान के तहत मान्यता की मांग पर चर्चा हुई। अमित शाह ने सभी पक्षों को भरोसा दिलाया कि केंद्र “भारत के संविधान के दायरे में” समाधान की दिशा में काम करेगा।
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समिति की जिम्मेदारी
अब केंद्र के दार्जिलिंग पहाड़ियों, दुआर्स और तराई के लिए वार्ताकार पंकज कुमार सिंह की अध्यक्षता में एक समिति बनाई जाएगी। सिंह पूर्व डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर, रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के पूर्व महानिदेशक हैं। उन्हें अक्टूबर 2025 में वार्ताकार नियुक्त किया गया था। समिति प्रस्तावित अंतिम समझौते का ढांचा तैयार करेगी और उसके तौर-तरीके तय करेगी।
केंद्र ने यह भी वादा किया है कि दार्जिलिंग में बुनियादी ढांचा विकास के लिए जरूरी फंड उपलब्ध कराया जाएगा। शाह ने पहाड़ी प्रतिनिधियों को आश्वासन दिया कि लंबित मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाएगा और विकास संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए पर्याप्त केंद्रीय सहायता दी जाएगी।
बैठक में शामिल रहे प्रमुख चेहरे
बैठक में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के प्रमुख बिमल गुरुंग और वरिष्ठ नेता रोशन गिरी, गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के अध्यक्ष मन घीसिंग, भाजपा दार्जिलिंग सांसद राजू बिष्ट, राज्यसभा सांसद हर्षवर्धन श्रृंगला, पहाड़ियों से भाजपा विधायक और राज्य सरकार के अधिकारी मौजूद थे।
रोशन गिरी ने कहा, “केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस मुद्दे के समाधान के लिए जो भी रास्ता निकलेगा, वह संवैधानिक ढांचे के तहत होगा। मैं संवैधानिक समाधान के पक्ष में हूं और मैंने उसी के अनुरूप अपने सुझाव रखे हैं।”
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भाजपा सांसद राजू बिष्ट ने बैठक को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि यह बैठक 1988 के गोरखा समझौते की वर्षगांठ के आसपास हुई, जिसके तहत दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (डीजीएचसी) का गठन हुआ था। बिष्ट ने आरोप लगाया कि पिछले दशकों में वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस सरकारों ने पहाड़ी लोगों की आकांक्षाओं को कुचला। उन्होंने 2,000 से अधिक लोगों की शहादत, 5,000 से ज्यादा विस्थापन और महिलाओं के साथ अत्याचार का जिक्र किया।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और चुनौतियां
1988 के समझौते के बाद डीजीएचसी और 2011 में गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) का गठन हुआ, लेकिन इनमें से कोई भी व्यवस्था व्यापक राजनीतिक समाधान की मांग को पूरा नहीं कर सकी। पहाड़ी नेताओं का कहना रहा है कि इन संस्थाओं के पास पर्याप्त अधिकार, वित्तीय स्वायत्तता और संवैधानिक सुरक्षा नहीं है।
गोरखा समुदाय की व्यापक मांगों में 11 समुदायों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा, संवैधानिक सुरक्षा, जमीन के अधिकार, आर्थिक विकास, चाय बागानों, रोजगार और बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं।
भाजपा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान वादा किया था कि राज्य में सरकार बनने के छह महीने के भीतर गोरखा मुद्दे का समाधान किया जाएगा। 22 अगस्त की बैठक में अंतिम समझौते का सटीक स्वरूप स्पष्ट नहीं किया गया। इसमें बंगाल के भीतर अधिक प्रशासनिक स्वायत्तता से लेकर नई संवैधानिक व्यवस्था तक के विकल्प शामिल हो सकते हैं, लेकिन केंद्र ने साफ किया है कि कोई भी समाधान मौजूदा संवैधानिक ढांचे के भीतर ही होगा।
अब पंकज कुमार सिंह की अध्यक्षता वाली समिति पर निर्भर करेगा कि समाधान का स्वरूप क्या होगा और क्या यह पश्चिम बंगाल की क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखते हुए पहाड़ियों की आकांक्षाओं को संतुष्ट कर पाएगा। फिलहाल केंद्र ने पहाड़ियों को स्थायित्व का भरोसा दिया है। अब देखना होगा कि इस स्थायित्व का वास्तविक मतलब क्या निकलता है।
वी न्यूज 24 | नई दिल्ली
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