नेपाल बाढ़ का असर भारत तक? बिहार-यूपी अलर्ट पर ,एनडीआरएफ-एसडीआरएफ तैनात, अगले 24-48 घंटे महत्वपूर्ण

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नई दिल्ली | स्थानीय रिपोर्टर: संजय मेहता
नेपाल-तिब्बत सीमा पर बुधवार को आई भीषण फ्लैश फ्लड ने सिर्फ नेपाल में तबाही नहीं मचाई, बल्कि इसका असर भारत के मैदानी इलाकों तक पहुंचने की आशंका ने बिहार और उत्तर प्रदेश को भी अलर्ट पर ला दिया है। हिमालय से निकलने वाली नदियों का पानी सीमाओं को नहीं मानता और नेपाल में पैदा हुआ अचानक जलप्रवाह कुछ ही घंटों में भारतीय नदी तंत्र पर दबाव बढ़ा सकता है।
फिलहाल सबसे ज्यादा निगाह नारायणी-गंडक नदी तंत्र पर है। नेपाल के रसुवा जिले में आई इस अचानक बाढ़ ने बस्तियों, सड़कों, पुलों और बिजली परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया है। शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं और सैकड़ों लोग लापता हैं।
भारत में सबसे संवेदनशील इलाका
नेपाल की भोटे कोशी नदी आगे चलकर त्रिशूली नदी तंत्र से जुड़ती है। त्रिशूली देवघाट के पास काली गंडकी से मिलकर नारायणी बनाती है और यही नदी भारत में प्रवेश करने के बाद गंडक कहलाती है। इसलिए नेपाल में ऊपरी हिस्से में अचानक आया बड़ा जलप्रवाह भारत में सीधे गंडक के जलस्तर पर असर डाल सकता है।
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भारत के लिए सबसे संवेदनशील इलाका पश्चिमी चंपारण का वाल्मीकिनगर क्षेत्र है। इसके बाद गंडक का पानी गोपालगंज, पूर्वी चंपारण, सारण और उत्तर बिहार के दूसरे इलाकों में बाढ़ का दबाव बढ़ा सकता है। उत्तर प्रदेश में महाराजगंज और कुशीनगर को भी अलर्ट किया गया है।
बिहार में आपदा प्रबंधन तंत्र को सक्रिय किया गया है और एनडीआरएफ-एसडीआरएफ की टीमें संवेदनशील इलाकों में तैनात की गई हैं। उत्तर प्रदेश में भी सीमावर्ती जिलों को सतर्क किया गया है।
क्या बिहार में बड़ी बाढ़ आ सकती है?
इस सवाल का सीधा जवाब अभी ‘हां’ या ‘नहीं’ में देना जल्दबाजी होगी। नेपाल की बाढ़ का हर हिस्सा भारत में बाढ़ में तब्दील नहीं होता। इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कितनी मात्रा में पानी भारतीय सीमा तक पहुंचता है, रास्ते में नदी का फैलाव कितना होता है और उस समय गंडक तथा उसकी सहायक नदियों का जलस्तर कितना है।
केंद्रीय जल आयोग की चेतावनी के बाद बिहार और उत्तर प्रदेश में गंडक के किनारे निगरानी बढ़ाई गई है। नेपाल के देवघाट पर नारायणी का जलस्तर बुधवार को चेतावनी सीमा से नीचे था, लेकिन जलप्रवाह में तेजी दर्ज की गई। वाल्मीकिनगर बैराज पर भी पानी के दबाव को देखते हुए गेटों को चरणबद्ध तरीके से खोला जा रहा है।
अभी भारत में नेपाल जैसी अचानक तबाही नहीं हुई है, लेकिन खतरा टला भी नहीं है।
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कोसी, बागमती और घाघरा भी खतरे में?
यहां सावधानी जरूरी है। नेपाल से निकलने वाली सभी नदियां एक ही नदी तंत्र का हिस्सा नहीं हैं। मौजूदा फ्लैश फ्लड का सबसे सीधा संबंध नारायणी-गंडक प्रणाली से है। कोसी, बागमती और घाघरा अलग नदी तंत्रों से संबंधित हैं। इसलिए नेपाल की इस खास बाढ़ को सीधे इन सभी नदियों में एक साथ जलप्रलय का कारण मानना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
हालांकि नेपाल में जारी भारी बारिश और अलग-अलग नदी घाटियों में जलस्तर बढ़ने की स्थिति भारत के लिए अलग जोखिम पैदा कर सकती है। खासकर बिहार पहले से ही मानसूनी बाढ़ के लिहाज से बेहद संवेदनशील राज्य है।
सीमा पार चेतावनी प्रणाली की जरूरत
नेपाल की इस आपदा से भारत के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—सीमा पार आपदा की समय रहते सूचना कितनी तेजी से पहुंचती है? हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन, हिमस्खलन, ग्लेशियल झीलों के टूटने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं में चेतावनी के लिए कई बार मिनटों और घंटों का अंतर ही जीवन और मौत के बीच फर्क पैदा करता है।
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भारत-नेपाल की नदियां साझा हैं, लेकिन बाढ़ प्रबंधन अभी भी बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर संचालित होता है। ऐसी घटनाएं दिखाती हैं कि दोनों देशों के बीच रियल-टाइम नदी डेटा, रडार आधारित मौसम सूचना, बैराज संचालन और आपदा चेतावनी प्रणाली को और मजबूत करने की जरूरत है।
जलवायु परिवर्तन ने ग्लेशियरों के पिघलने, अस्थिर पर्वतीय ढलानों और अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में बढ़ोतरी कर अचानक बाढ़ का जोखिम बढ़ाया है। नेपाल की मौजूदा त्रासदी को केवल एक देश की प्राकृतिक आपदा मानना पर्याप्त नहीं होगा। हिमालय में होने वाली ऐसी घटनाओं का असर नेपाल से निकलकर भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश और आगे गंगा के मैदानी क्षेत्र तक पहुंच सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा जोखिम गंडक नदी तंत्र के जरिए बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाकों पर है। अगले 24 से 48 घंटे नदी के जलस्तर और नेपाल से आने वाले अतिरिक्त पानी की निगरानी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं।
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