दो दशक पुराने मानहानि मुकदमे का अंत: साकेत अदालत ने एलजी वीके सक्सेना को किया बरी, पहले मेधा पाटकर को भी मिली थी रिहाई
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✍️ रिपोर्टर:तन्वी शर्मा
नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना और सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर के बीच चले आ रहे लगभग बीस साल के कानूनी विवाद पर आज अदालत ने अंतिम मुहर लगा दी। साकेत अदालत ने पहले मेधा पाटकर को और अब एलजी वीके सक्सेना को आपसी मानहानि के मामलों में बरी कर दिया है, जिससे दोनों ही पक्षों को कानूनी राहत मिल गई है।
मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट राघव शर्मा की अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मेधा पाटकर द्वारा लगाए गए आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो पाए हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता पक्ष आरोपी के खिलाफ अपना मामला पुख्ता तरीके से सिद्ध करने में विफल रहा है, इसलिए आईपीसी की धारा 500 के तहत दिल्ली के उपराज्यपाल को दंडनीय अपराध से मुक्त किया जाता है।
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2006 की टीवी बहस बनी थी विवाद की जड़
यह पूरा मामला वर्ष 2006 का है, जब वीके सक्सेना राष्ट्रीय नागरिक स्वतंत्रता परिषद (एनसीसीएल) के अध्यक्ष थे। 20 अप्रैल 2006 को एक निजी टीवी चैनल पर प्रसारित एक चर्चा कार्यक्रम के दौरान नर्मदा बचाओ आंदोलन की अगुआ मेधा पाटकर ने सवाल उठाया था कि सक्सेना की संस्था ने सरदार सरोवर निगम से सिविल ठेका लिया था। इस टिप्पणी को अपनी प्रतिष्ठा के लिए हानिकारक बताते हुए सक्सेना ने उसी वर्ष पाटकर के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया था।
वहीं, मेधा पाटकर ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए सक्सेना के विरुद्ध अलग से मानहानि का मामला दायर किया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सक्सेना ने उनके खिलाफ अपमानजनक बयान दिए थे।
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पहले मेधा पाटकर को मिली थी रिहाई
इसी साकेत अदालत ने कुछ समय पहले ही वीके सक्सेना द्वारा दायर उस मानहानि मामले में भी मेधा पाटकर को बरी कर दिया था। उस फैसले में भी अदालत ने यही तर्क दिया था कि शिकायतकर्ता पक्ष आरोप को उचित संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। दोनों ही मामलों में अदालत का मानना रहा कि मामले में पर्याप्त सबूतों का अभाव है।
दोनों पक्षों को मिली कानूनी राहत
इस तरह एक ही अदालत ने दोनों ही पक्षों को एक दूसरे के खिलाफ लगाए गए आरोपों से मुक्त कर दिया है, जिससे इस लंबे चले कानूनी विवाद का समापन हो गया है। हालाँकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि क्या कोई भी पक्ष इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय का रुख करेगा।
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यह फैसला ऐसे समय आया है जब वीके सक्सेना दिल्ली के उपराज्यपाल के रूप में कार्यरत हैं और मेधा पाटकर पर्यावरण एवं मानवाधिकार मुद्दों पर सक्रिय रहती हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि मानहानि के मामलों में आरोप साबित करने की भारी जिम्मेदारी शिकायतकर्ता पर ही होती है।
वी न्यूज 24 इस मामले के किसी भी नए विकास पर नजर बनाए हुए है और अपने पाठकों को तुरंत अवगत कराएगा।
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