सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए विवादित नियमों पर लगाई रोक, CJI का बड़ा बयान- "नहीं रोके तो समाज बंट जाएगा"
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✍️ रिपोर्टर:कृतिका मिश्रा
नई दिल्ली :- उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नए विनियमों पर एक बड़ा अंतरिम फैसला सुनाते हुए उन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की खंडपीठ ने कहा कि नए नियमों में प्रावधान अस्पष्ट हैं और इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है, जिससे समाज में गहरी दरार पैदा होने का खतरा है। अदालत ने निर्देश दिया कि अगले आदेश तक 2012 के विनियम ही लागू रहेंगे। अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।
यह मामला यूजीसी के उन नए विनियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं से जुड़ा है, जिनमें 'जाति आधारित भेदभाव' की परिभाषा केवल अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के विरुद्ध ही रखी गई है, जिससे सामान्य वर्ग के लोग पूरी तरह बाहर हो जाते हैं।
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"समाज विभाजित होगा": CJI का तल्ख टिप्पणी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट शब्दों में चिंता जताई। उन्होंने कहा, "अगर हम इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करते हैं, तो इसके खतरनाक परिणाम होंगे। समाज विभाजित होगा और इसके गंभीर प्रभाव होंगे।" उन्होंने आगे कहा कि इस तरह के नियम छात्रावासों में दरार पैदा कर सकते हैं, जहां एक ही छत के नीचे रहने वाले छात्रों के बीच अलगाव का भाव पैदा होगा।
याचिकाकर्ता के वकील का तर्क
याचिकाकर्ता के वकील विष्णु जैन ने अदालत में दलील दी कि नए विनियमों की धारा 3(सी) अनुच्छेद 14 के मूल अधिकार के पूरी तरह विपरीत है। उन्होंने कहा, "अनुच्छेद 14 में भेदभाव को पहले ही परिभाषित किया जा चुका है। यह मान लेना उचित नहीं होगा कि भेदभाव केवल एक वर्ग के विरुद्ध ही होता है।"
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जस्टिस जोयमाल्या ने अमेरिकी इतिहास से दी चेतावनी
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला ने एक गंभीर चेतावनी देते हुए कहा, "मुझे उम्मीद है कि हम अमेरिका जैसे अलग विद्यालयों में नहीं जाएंगे, जहां अश्वेत और श्वेत अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते थे।" उन्होंने सवाल उठाया कि जब धारा 3(ई) में पहले से ही 3(सी) का सार निहित है, तो इसे अलग प्रावधान के रूप में क्यों लाया जा रहा है।
CJI का राज्यों के भीतर असमानता पर सवाल
मुख्य न्यायाधीश ने एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए कहा, "75 वर्षों में हमने एक वर्गहीन समाज बनने के लिए जो कुछ हासिल किया है, क्या हम इससे एक प्रगतिशील समाज बना रहे हैं?" उन्होंने पंजाब के उदाहरण से समझाया कि कैसे एक ही अनुसूचित जाति के भीतर कुछ समूह ('ए') संपन्न हैं और कुछ ('बी') वंचित, यह दर्शाता है कि आरक्षित समुदाय के भीतर भी आर्थिक असमानता मौजूद है।
निष्कर्ष और अगली सुनवाई
अदालत ने यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए इसे 2019 से लंबित एक संबंधित याचिका के साथ जोड़ दिया है। साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश से हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए मौजूदा निवारण प्रणाली प्रभावित नहीं होगी और वह यथावत बनी रहेगी। 19 मार्च तक, 2012 के नियम ही देश भर के उच्च शैक्षणिक संस्थानों में लागू रहेंगे। यह फैसला लाखों छात्रों और शिक्षकों को प्रभावित करेगा और भेदभाव रोकने के कानूनी ढांचे पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
वी न्यूज 24 इस महत्वपूर्ण मामले की हर घटना पर नजर बनाए हुए है और 19 मार्च की सुनवाई पर भी पूरी कवरेज देगा।
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