RSS के शताब्दी वर्ष पर मोहन भागवत का बड़ा संदेश: 'वंदे मातरम् पूरे स्वाभिमान से गाएं', AI, स्वदेशी और सामाजिक एकता पर देश को चेताया
नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विजयदशमी समारोह में राष्ट्रभक्ति, सामाजिक समरसता और नई पीढ़ी के भविष्य पर मंथन; मुख्य अतिथि संजय गुप्त ने संघ की 100 वर्षों की यात्रा और भारतीय संस्कृति में उसके योगदान को किया रेखांकित
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विशेष रिपोर्ट | स्थान: नागपुर | प्रकाशित: 20 अक्टूबर 2026
नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में नागपुर में आयोजित विजयदशमी उत्सव में राष्ट्रभक्ति, सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक एकता, तकनीकी विकास और नई पीढ़ी के भविष्य को लेकर व्यापक विचार रखे गए। समारोह को संबोधित करते हुए सरसंघचालक मोहन भागवत ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के प्रति सम्मान, भारतीय संस्कृति के मूल्यों और समाज में एकता बनाए रखने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया।
भागवत ने कहा कि भारत की प्रगति केवल आर्थिक और तकनीकी उपलब्धियों से नहीं मापी जा सकती। देश को वास्तविक रूप से सशक्त बनाने के लिए समाज में नैतिकता, अनुशासन, कर्तव्यबोध और राष्ट्रीय एकात्मता का भाव भी मजबूत होना चाहिए।
इस अवसर पर दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने संघ की वैचारिक यात्रा, भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और राष्ट्र निर्माण में संगठन की भूमिका पर अपने विचार रखे।
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वंदे मातरम् को स्वाभिमान से गाने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए: मोहन भागवत
समारोह में मोहन भागवत ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित किया।
उन्होंने 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में वंदे मातरम् की प्रेरक भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि यह गीत आज भी देश को एकता के सूत्र में बांधने की क्षमता रखता है।
भागवत ने राष्ट्रगीत को पूरे सम्मान और स्वाभिमान के साथ गाने का आह्वान किया। उनका कहना था कि मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और समर्पण की भावना राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाती है।
उन्होंने वंदे मातरम् को केवल एक गीत नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरक विरासत के रूप में प्रस्तुत किया।
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'हम भारत के लोग' केवल संवैधानिक शब्द नहीं, राष्ट्रीय एकता का आधार
मोहन भागवत ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना का उल्लेख करते हुए कहा कि 'हम भारत के लोग' भारत की विविधताओं के बीच मौजूद भावनात्मक संबंध को व्यक्त करता है।
उन्होंने कहा कि देश में भाषाओं, जातियों, पंथों और परंपराओं की विविधता स्वाभाविक है, लेकिन इन सबके बीच राष्ट्रीय एकता और कर्तव्यबोध सर्वोपरि होना चाहिए।
भागवत के अनुसार, भारतीय समाज की वास्तविक शक्ति उसकी विविधताओं को स्वीकार करते हुए एक साथ आगे बढ़ने की क्षमता में निहित है।
उन्होंने नागरिकों से अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों के प्रति भी सजग रहने का आह्वान किया।
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हिंदू समाज का संगठन सभी पंथों के सम्मान के विरुद्ध नहीं
सरसंघचालक ने कहा कि संगठित और सामर्थ्यवान हिंदू समाज की बात करना अन्य पंथों के सम्मान या देश की भावनात्मक एकता के विरुद्ध नहीं है।
उनके अनुसार, भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि में समावेशिता, सद्भाव और परस्पर सम्मान की भावना का विशेष स्थान है।
उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य समाज में संगठन, अनुशासन, सदाचार और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना है।
भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी समाज की शक्ति केवल संख्या या संसाधनों से नहीं, बल्कि उसके नैतिक आचरण और परस्पर विश्वास से निर्धारित होती है।
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लोकतंत्र में आंदोलन जरूरी, लेकिन उद्देश्य समाधान होना चाहिए
देश में होने वाले विरोध प्रदर्शनों और आंदोलनों को लेकर मोहन भागवत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में समस्याएं सामने आएंगी और उनके समाधान के लिए आंदोलन भी होंगे।
लेकिन किसी आंदोलन का वास्तविक उद्देश्य समस्याओं का समाधान खोजना होना चाहिए, न कि समाज में तनाव, वैमनस्य या विभाजन पैदा करना।
उनका कहना था कि लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करते समय सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय हित का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
इस संदेश का व्यापक महत्व है, क्योंकि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है, जबकि हिंसा और सामाजिक विद्वेष से बचना भी आवश्यक है।
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AI और आधुनिक तकनीक पर चेतावनी: नैतिकता के बिना विकास विनाशकारी हो सकता है
मोहन भागवत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और तेजी से विकसित हो रही आधुनिक तकनीक के प्रभावों पर भी चिंता व्यक्त की।
उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति को रोका नहीं जा सकता और इससे मानव जीवन को अनेक लाभ मिल रहे हैं। लेकिन यदि तकनीक का उपयोग नैतिक विवेक और अनुशासन के बिना किया गया, तो इसके गंभीर दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं।
भागवत ने नई पीढ़ी को केवल तकनीकी रूप से दक्ष बनाने के बजाय नैतिक रूप से जिम्मेदार बनाने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि ज्ञान और तकनीक अपने आप में साधन हैं। उनका वास्तविक महत्व इस बात पर निर्भर करता है कि मनुष्य उनका उपयोग किस उद्देश्य और किस दिशा में करता है।
OTT और डिजिटल सामग्री पर अनुशासन की आवश्यकता
सरसंघचालक ने डिजिटल माध्यमों और OTT प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री के सामाजिक प्रभाव का भी उल्लेख किया।
उन्होंने चिंता जताई कि नई पीढ़ी विभिन्न डिजिटल माध्यमों से मिलने वाली सूचनाओं और मनोरंजन सामग्री को हमेशा उचित-अनुचित का विवेक किए बिना ग्रहण कर लेती है।
उनके अनुसार, इस स्थिति में अभिभावकों, शिक्षकों, समाज और सरकार की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
भागवत ने कहा कि डिजिटल माध्यमों के उपयोग में अनुशासन और जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के विषय पर शासन-प्रशासन को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
हालांकि डिजिटल सामग्री के नियमन के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, रचनात्मकता और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना भी एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक नीति का विषय है।
युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति पर चिंता
मोहन भागवत ने युवाओं में नशीले पदार्थों की लत को गंभीर सामाजिक चुनौती बताया।
उन्होंने कहा कि नशे की समस्या केवल किसी एक व्यक्ति या परिवार तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज के भविष्य और राष्ट्र की युवा शक्ति को भी प्रभावित करती है।
उन्होंने अभिभावकों, शिक्षकों, सामाजिक संगठनों और प्रशासन से मिलकर युवाओं में नैतिक विवेक, आत्मअनुशासन और सकारात्मक जीवन मूल्यों को विकसित करने का आह्वान किया।
उनके अनुसार, नई पीढ़ी को सही दिशा देना वर्तमान पीढ़ी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
स्वदेशी और स्वबोध से मजबूत होगा आत्मनिर्भर भारत
भागवत ने संघ की सौ वर्षों की यात्रा का उल्लेख करते हुए स्वदेशी और भारतीय सांस्कृतिक पहचान को महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने कहा कि संघ का कार्य समाज में अपने देश, संस्कृति और सभ्यतागत विरासत के प्रति जागरूकता विकसित करने से जुड़ा रहा है।
उन्होंने संघ के पंच परिवर्तन के विचारों का उल्लेख करते हुए सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य, स्वदेशी आचरण और सांस्कृतिक आत्मबोध की आवश्यकता पर जोर दिया।
भागवत के अनुसार, भारत को वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली भूमिका निभाने के लिए अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हुए आधुनिक चुनौतियों का समाधान खोजना होगा।
वैश्विक अस्थिरता और सत्ता परिवर्तन की घटनाओं पर भी बोले भागवत
मोहन भागवत ने विश्व के विभिन्न देशों में राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक उथल-पुथल की घटनाओं का उल्लेख किया।
उन्होंने फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल के घटनाक्रमों को वैश्विक स्तर पर चल रही राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता परिवर्तन की प्रवृत्तियों से जोड़कर देखा।
उन्होंने ऐसी घटनाओं के पीछे सुनियोजित प्रयास होने की आशंका व्यक्त की।
हालांकि इन देशों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं और सभी घटनाओं को किसी एक अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र का परिणाम मानने के लिए स्वतंत्र प्रमाण आवश्यक होंगे।
दुनिया की समस्याओं के समाधान में भारतीय दृष्टि की भूमिका
सरसंघचालक ने पर्यावरण संकट, सामाजिक संघर्ष और वैश्विक तनाव के बीच भारतीय सनातन चिंतन की प्रासंगिकता पर विचार रखे।
उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा संपूर्ण विश्व को एक परिवार मानने और विविधताओं के बीच समन्वय स्थापित करने का संदेश देती है।
भागवत के अनुसार, विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आज विश्व के सामने बड़ी चुनौती है।
उन्होंने संयम, त्याग, सामाजिक सद्भाव और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी को स्थायी विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया।
संजय गुप्त बोले: संघ ने भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया
विजयदशमी समारोह के मुख्य अतिथि एवं दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों की यात्रा पर अपने विचार रखे।
उन्होंने कहा कि संघ की स्थापना हिंदू समाज को संगठित करने, राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने और भारतीय सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के उद्देश्य से हुई थी।
संजय गुप्त ने अपने संबोधन में कहा कि संघ ने अनेक राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद अपने संगठनात्मक कार्यों को जारी रखा।
उनके अनुसार, संघ की वैचारिकता और अनुशासन ने भारतीय राजनीति तथा सामाजिक जीवन पर व्यापक प्रभाव डाला है।
भाजपा की संगठनात्मक सफलता में संघ की भूमिका पर संजय गुप्त की टिप्पणी
संजय गुप्त ने जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी तक की राजनीतिक यात्रा का उल्लेख करते हुए संघ की वैचारिक और संगठनात्मक भूमिका की चर्चा की।
उन्होंने कहा कि भाजपा के अनेक नेताओं में राष्ट्रीयता, अनुशासन और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संस्कार संघ की पृष्ठभूमि से जुड़े रहे हैं।
उन्होंने भाजपा की संगठनात्मक सफलता में संघ की वैचारिक परंपरा के योगदान को महत्वपूर्ण बताया।
यह टिप्पणी संघ और भाजपा के बीच ऐतिहासिक वैचारिक संबंधों को रेखांकित करती है। हालांकि दोनों अलग-अलग संगठन हैं और उनकी औपचारिक भूमिकाएं भिन्न हैं।
शस्त्र पूजन, ध्वजारोहण और पथ संचलन के साथ हुआ समारोह
नागपुर में आयोजित विजयदशमी कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक शस्त्र पूजन से हुई।
इसके बाद ध्वजारोहण, संघ प्रार्थना, पथ संचलन और स्वयंसेवकों द्वारा शारीरिक अभ्यास का प्रदर्शन किया गया।
सरसंघचालक मोहन भागवत और मुख्य अतिथि संजय गुप्त ने संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की स्मृति में श्रद्धासुमन अर्पित किए।
समारोह में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
WE NEWS 24 विशेष विश्लेषण: अगले 100 वर्षों में संघ के सामने क्या होंगी चुनौतियां?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष केवल संगठन के इतिहास का उत्सव नहीं, बल्कि उसके भविष्य की दिशा पर विचार करने का भी अवसर है।
मोहन भागवत के संबोधन में राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक पहचान के साथ AI, डिजिटल माध्यमों, नशे, पर्यावरण और सामाजिक समरसता जैसे आधुनिक विषयों का समावेश महत्वपूर्ण है।
आज भारत के सामने आर्थिक विकास के साथ रोजगार, शिक्षा, तकनीकी बदलाव, सामाजिक समानता, पर्यावरण संरक्षण और लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास मजबूत करने जैसी चुनौतियां मौजूद हैं।
ऐसे में सामाजिक संगठनों की भूमिका का मूल्यांकन उनके विचारों के साथ-साथ समाज में किए गए वास्तविक कार्यों और उनके परिणामों से भी होना चाहिए।
संघ की अगली यात्रा के संदर्भ में महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि वह सांस्कृतिक और संगठनात्मक गतिविधियों के साथ बदलते भारत की सामाजिक चुनौतियों से किस तरह जुड़ता है।
नागपुर के इस समारोह से मोहन भागवत ने राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, सामाजिक सद्भाव, तकनीक के जिम्मेदार उपयोग और सांस्कृतिक आत्मविश्वास का संदेश देने का प्रयास किया।
सवाल अब यही है कि शताब्दी वर्ष के बाद संघ इन विचारों को समाज के विभिन्न वर्गों तक किस रूप में पहुंचाता है और इनके व्यावहारिक परिणाम क्या होते हैं।
WE NEWS 24 | विशेष रिपोर्ट | नागपुर






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