केंद्र के फैसले से बिहार को बड़ा झटका: आबादी के हिसाब से मेडिकल कॉलेज का सपना टूटा, दक्षिणी राज्यों की चांदी
We News 24 : डिजिटल डेस्क »✍️रिपोर्ट: वी न्यूज 24 ब्यूरो
नई दिल्ली / पटना। :- केंद्र सरकार के एक ताजा फैसले ने बिहार की स्वास्थ्य शिक्षा से जुड़ी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा मेडिकल कॉलेजों की स्थापना में आबादी के आधार पर तय किए गए मानक को फिलहाल लागू न करने का निर्णय लिया गया है। इसका सीधा नुकसान बिहार जैसे राज्यों को होगा, जहां पहले से ही डॉक्टरों और मेडिकल सीटों की भारी कमी है।
दरअसल, एनएमसी ने प्रस्ताव रखा था कि देश में मेडिकल कॉलेज और एमबीबीएस सीटों की मंजूरी आबादी के अनुपात में दी जाएगी। इसके तहत 10 हजार की आबादी पर एक एमबीबीएस सीट का मानक तय किया गया था। अगर यह नियम लागू होता, तो सबसे ज्यादा फायदा बिहार जैसे घनी आबादी वाले राज्य को मिलता।
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बिहार की आबादी करीब 13 करोड़ है, लेकिन यहां एमबीबीएस की सीटें लगभग 3 हजार के आसपास ही हैं। इसका मतलब यह हुआ कि बिहार में करीब 43 हजार की आबादी पर सिर्फ एक मेडिकल सीट उपलब्ध है। यह स्थिति किसी भी लिहाज से संतोषजनक नहीं कही जा सकती।
तुलना करें तो उत्तर प्रदेश की आबादी लगभग 24 करोड़ है और वहां करीब 13,500 मेडिकल सीटें हैं। लेकिन असली फर्क दक्षिण भारत के राज्यों में दिखाई देता है।
केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पुदुचेरी जैसे राज्यों में पहले से ही मेडिकल कॉलेजों और सीटों की संख्या काफी ज्यादा है। इन राज्यों की कुल आबादी करीब 27 करोड़ है, जबकि यहां लगभग 50 हजार एमबीबीएस सीटें मौजूद हैं।
अब केंद्र सरकार ने एनएमसी के आबादी आधारित फॉर्मूले को सत्र 2026-27 के लिए लागू न करने और नए मेडिकल कॉलेजों के लिए फिर से आवेदन मंगाने का फैसला किया है। इसका सीधा फायदा उन्हीं राज्यों को मिलेगा, जहां पहले से मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत है। यानी दक्षिण के राज्य एक बार फिर आगे निकल जाएंगे और बिहार जैसे राज्य पीछे ही रह जाएंगे।
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स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आबादी आधारित फॉर्मूला लागू होता, तो बिहार में दर्जनों नए मेडिकल कॉलेज खुलने का रास्ता साफ हो सकता था। इससे न सिर्फ डॉक्टरों की कमी दूर होती, बल्कि राज्य के छात्रों को बाहर जाने की मजबूरी भी नहीं रहती।
लेकिन अब इस फैसले से बिहार की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है।
राजनीतिक गलियारों में भी इस निर्णय को लेकर चर्चाएं तेज हैं, क्योंकि यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिनमें दक्षिण भारत के राज्य भी शामिल हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर इस फैसले से फायदा किसे हुआ?
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जवाब साफ है — जिन राज्यों में पहले से मेडिकल कॉलेजों की भरमार है, वही एक बार फिर फायदे में रहेंगे।
बिहार के लिए यह फैसला स्वास्थ्य और मेडिकल शिक्षा दोनों मोर्चों पर एक बड़ी चोट की तरह देखा जा रहा है, जिसका असर आने वाले कई वर्षों तक महसूस किया जा सकता है।
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